?बेगुनाही की सजा? सुबह सुबह मोहल्ले के सामने वाले घर में शोर सुन नीता ने फ्लैट की खिड़की खोल देखा तो पाया सामने एक सिंधी परिवार के मुखिया के मौत हो गई है।
पर नीता की नजर में वह जिंदा था ही नहीं क्योंकि उसे शराब की बुरी लत थी रोज रात दिन शराब पीकर बच्चों और
अपनी पत्नी को भी मारता पीटता पत्नी जैसे तैसे लोगों के कपड़े सी सी कर घर चलाती थी, उस पर भी उसको संतोष नहीं था उसके कमाए रुपए पैसे हड़प कर दारू में उड़ा देता था। ऐसे इंसान का जिंदा रहना उसके वजूद को स्वीकारना नीता का दिल गवाही नहीं देता था
अर्थी की विदाई होने के बाद जिंदगी मै शायद पहली बार यह अचंभा देखा हां हमारे लिए यह अचंभा ही था की उस व्यक्ति की पत्नी को घर की बड़ी बुजुर्ग औरतें घर के बाहर लाकर चारों तरफ से घेर कर खड़ी हो गई और उस पर बाल्टी में पानी भर कर उसके ऊपर डालने लगी वह बेचारी सूखी हड्डियों का ढांचा थी कपड़े समेत पानी से भीगते हुए भी उसकी कंपकंपी आसानी से दिखी जा सकती थी ।
मुझे यह रिवाज कुछ समझ में नहीं आया कि घर के बाहर किसी नारी को इस प्रकार से नहलाया जाए।
मुझसे रहा नहीं गया तो फ्लैट के नीचे रहते सिंधी परिवार की एक दादी से पूछा की दादी आपके यहां यह कैसा रिवाज है
दादी बोली हमारे में यही रिवाज है कि पति के मरने के बाद उसकी पत्नी को घर में नहीं ले जाया जाता तब तक कि उसे बाहर ही स्नान ना करा दिया जाए।
हमारा दिमाग शून्य पड़ गया सोचने समझने की क्षमता खत्म हो गई ऐसा मुझे प्रतीत होने लगा अचानक दादी से पूछा
दादी क्या आप के समाज में पति के मरने से पत्नी को इस प्रकार से घर के बाहर स्नान कराया जाता है तो क्या पत्नी के मरने के बाद पति को भी इस प्रकार बाहर खड़ा करके स्नान कराया जाता है।
दादी गुस्से मैं चीखती सी बोली तू पागल है क्या है। ऐसा भी कभी होता है, के मर्द को बाहर नहलाया जाए ,मर्द के लिए थोड़ी ना यह नियम है।ये तो औरत के मरने पर नही बल्कि पति के मरने पर पत्नि केलिए नियम है। पति तो घर का रखवाला है,परिवार चलाने वाला है, उस पर विधवा का सिक्का थोड़ी ना लगता है यह तो विधवा औरतों के लिए बनाए गए नियम है।
वाह दादी कितने अच्छे नियम बनाए गए हैं पति के जीते जी अगर पति खराब है शराबी है ,तो औरत को दुख दर्द सह कर पति के होते हुए भी विधवा सा जीवन जीना पड़ता है। पति के मरने के बाद तो उसे घर के बाहर नहला कर बेइज्जत कराया जाता है ।
यानि कि उसका अपना कोई अस्तित्व नही है ,कोई मान सम्मान नहीं है। जब जिसका जैसा जी चाहा उसके साथ व्यवहार किया और स्त्री मुक बनी गुनहगार ना होते हुए भी गुनहगार साबित होती गई।
वाह रे हमारे थोथे थोपे गए रीती रिवाज।
डॉ प्रियंका सोनी "प्रीत"