#Kavyotsav
विषय : भावनाप्रधान कविता
कितना अरसा गुजर गया यूँ
विरह गीत गाते-गाते।
कितने अश्कों ने दम तोड़ा
पलकों तक आते-आते॥
अब तक लाखों ख्वाहिश छोड़ी, एक जरूरत की खातिर।
जीवन में फिर भी उलझन है, जब इच्छाएं हुई सिफ़र॥
किंतु न अब तक नियति थकी है जुल्मों को ढाते-ढाते । कितने अश्कों...
जर्जर वीणा थर- थर स्वर हैं, दर्द वांसुरी भरी हुई।
कौन सुनेगा मेघ मल्हारें, जब सरगम हो रोज नई॥
गीत हजारों दफन हुए हैं होठों तक आते- आते। कितने अश्कों...
अरमानों की चिता जलाई, तब तक महफिल खूब जमी।
जब से कोशिश की हँसने, की शुरू हो गई तनातनी॥
आखिर में हरजाई बने हम महफिल से जाते-जाते। कितने अश्कों...
अब तक चलना सीख न पाया, इन पेचीदी राहों में।
सरल डगर पर चलने वाला, भूला पंथ घुमावों में॥
ठहर गए क्यों कदम अचानक मंजिल को पाते-पाते।
कितने अश्कों ने दम तोड़ा पलकों तक आते-आते॥
- उदय