#KAVYOTSAV -2
गीत
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गीत बैठे दर्शकों में
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मंच पर प्रहसन खड़े हैं, थाम अभिनय की कलाई।
गीत बैठे दर्शकों में, रोकते अपनी रुलाई।।
तालियों की चाह है, उत्तेजना की पंक्तियों को,
इसलिए उन्माद के लम्हे परोसे जा रहे हैं।
वाकपटुता में छिपी अब, काव्य की अभिव्यंजनाएँ,
उग्रता के वीर पाले और पोसे जा रहे हैं।
कंठ का माधुर्य ही, श्रोताओं से पाता बड़ाई।।
दूसरों के दर्द के अहसास से ख़ाली हुए दिल,
आज शायद वेदना के गीत गाना अटपटा हो।
लोग कवि-सम्मेलनों में, आ रहे उम्मीद लेकर,
मंच पर हो कुछ मनोरंजन, मसाला चटपटा हो।
पर इन्हीं सब चटपटों ने, मंच की गरिमा गिराई।।
गीत जो मन को छुएँ, संवेदनाओं को टटोलें,
आप लिखिए तो सही, पर डायरी में बन्द करिए।
बैठकर एकान्त में, जब मन करे, तब गुनगुना लें,
और उसकी कल्पना के लोक में ख़ुद ही विचरिए।
आज फिर 'बृजराज' ने, कवि-धर्म की विपदा सुनाई।।
--बृज राज किशोर 'राहगीर'