मुझे ही काटते हो,,,,,,,कविता
कुछ पल आराम की चाहत में
मेरी छांव तले जब तुम आते हो
ये छांव तुम्हें याद क्यों नही आती
उस वक्त जब तुम मुझे काटते हो!!!
दवा औषधि का करते हो
संसार में व्यापार अपार
मुझसे ही तू सांसे लेता है
फिर भी मुझे ही काटते हो!!!
तुलसी, पीपल, शमी, केले
इन पेड़ों की पूजा करते हो
ये भी तो मेरा ही रूप है
फिर भी मुझे ही काटते हो!!!
मुझसे ही सारी सृष्टि चलती है
मुझसे ही चलता मानव तेरा संसार
बात समझकर नासमझ बनते हो
फिर भी मुझे ही काटते हो!!!
बोल नही पाता मैं लेकिन
मुझमें भी सांसे चलती हैं
कभी तो मेरी पीड़ा को समझो
फिर भी मुझे ही काटते हो!!!
ऐ मानव संभल जा तू
वरना तेरे ही हाथों होगा
सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश
अब ना मुझे काटना तू!!!