#KAVYOTSAV -2
कविता -आध्यत्म
अंधकार में स्वयं को कुछ इस कदर मैं रखूं
पर्दा हटाऊँ आँखों से, वास्तविकता मैं देखूँ
है कितना अभिमान मुझमें,
दूसरे को मैं कमतर आंकूँ
छल-कपट, निंदा में स्वयं को डुबा के रखूँ
अंधकार में स्वयं को कुछ इस कदर मैं रखूँ
जीवन में कामना बस धन की, प्रसिद्धि का भूखा हूँ
स्वार्थवश रिश्ते बनाऊं, स्वार्थवश रिश्ते त्याग दूँ
नहीं मुझे परवाह किसी की,
अपनी के आगे ना चलने दूँ
मिलता हूँ झूठा सा बन कर, घृणा ह्रदय में इतनी रखूँ
अंधकार में स्वयं को इस कुछ इस कदर मैं रखूँ
मानव हूँ मैं, मानवता का ही उपहास उड़ाऊँ
सच्चा नहीं खुद, बस खुद को सच्चा ही बतलाऊँ
माटी का ही पुतला हूँ,
जाने किस बात पर मैं इतराऊँ
ना देखे अपने ऐब कभी, दूसरे को दर्पण दिखलाऊँ
अंधकार में स्वयं को कुछ इस कदर मैं रखूँ