"जब एक अंधे ने सही राह दिखलाई!!"
तकरीबन दो महीने बीतने को आए और आशिष आज भी बेरोज़गार बैठा है। ग्रेजुएशन अच्छे नंबरों से पास किया था,सोचा कि उसे अब आराम से नौकरी मिल जाएगी।
आशिष नौकरी की तलाश में भटकने लगा लगभग दस से ज्यादा कंपनियों में 'इंटरव्यूस' दिए...पर कोई भी कंपनी उसे लेने को तैयार नहीं हुई!
बेकारी के कारण घर में हमेशा सोते रहना, मोबाईल फ़ोन पर समय बर्बाद करना, जैसे उसकी 'दिनचर्या' बन गई हो। बेरोज़गारी के कारण वह चिड़चिड़ा-सा हो गया था, मानो 'डिप्रेशन' के झाल में फँसते जा रहा हो!
एक दिन उसे 'interview call' आया, कंपनी की H.R Head को दबी आवाज़ में interview देने के लिए हाँ तो कर लिया , पर उसका मन अब भी रो रहा था। हांलाकि मन को मनाया और interview देने के लिए निकल पड़ा।
बस में चढ़कर, दूसरी बस बदलने के लिए शहर के मुख्य बस स्टेशन पहुंच गया। लोगों की भीड़ और फेरिये वालों की आवाजों के बीच एक "गरजती" हुई आवाज आई "शू पोलिश...शू पोलिश,आपके जूतों को 'आइने' की तरह चमकाए, जब आपका मगन मोची आए!" आशिष ने भी अपनी 'जिज्ञाष़ा' को संतुष्ट करने के लिए पास जा़कर देखा तो आश्चर्यचकित हो गया! पता चला कि मगन "दिव्यांग" है, आँखो से देख नहीं पाता है, फिर भी वो इतना संघर्ष कर रहा था!
आँखों से न देख पाने पर भी जीवन की नाव को आगे बढ़ाते रहने का 'परिश्रम' और चहरे पे हंसी देखकर आशिष भावुक हो गया और उसे जीवन का सार समझ में आ गया! ठाना कि "चिंता करने से कुछ नहीं होता, मेरे पास तो पूरा शरीर है पैसे कमाने को और मैं इतनी जल्दी हार मान गया, अभी मैं संघर्ष करूँगा, लडूँगा इन खराब परिस्थितियों के खिलाफ, पर कभी हार न मानूंगा!"
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