बन भँवरा मैं घूम रहा था .फूलों की हर डाली पर ।
मन करता न्योछावर कर दूँ जीवन इस हरियाली पर ।
शान्त पवन है शान्त गगन है शान्त हृदय का हर कोना है।
संभवतः सुख ही का मतलब नीरव और शान्त होना है।।
मैं बैठा हूँ जिस डाली पर लगे फूल के अधरों पर ।
मंत्र मुग्ध सा देख रहा है कंपित होती हृद लहरों को।
उठ विद्यालय कब जाएगा माँ का स्नेहिल स्वर गूँजा।
मेरा मन धर मानव तन झटपट बिस्तर से कूदा।।