Moral Stories
बदलती दिशाएँ
"इन बच्चों ने भी न, कितना कबाड़ आलमारी के ऊपर जमा कर रखा है।" जैसे ही सत्या ने सामान हटाया।
"ये क्या ? इतनी सारी पतंगे ?"
पतंगों को देखते ही सत्या का मन भी अतीत की उड़ान भरने लगा। पिछले साल इन्हीं दिनों उसके पति का देहांत हो गया था। तो बच्चों ने पतंग उड़ाई ही नहीं थी।
तीन बेटे बहुएँ के साथ नाती पोतो से भरा-पूरा उसका संयुक्त परिवार हैं। जिस कारण घर में हमेशा चहल-पहल बनी रहती थी। किन्तु एक साल से घर में वीरानी सी छाई है। सारे त्यौहार फीके रहें हैं।
उसका मन लगातार हिलोरें मार रहा था।
कहीं उसकी वजह से तो नहीं घर में सभी चुप रहते हैं। क्योंकि वहपहले जैसे न तो किसी को टोकती है, न ही डांटती है और सब से बोलना भी कम कर दिया है अक्सर चुप ही रहती है।
न.. अब तो इस घर से दुख की धूल हटाना ही होगा। तभी तो खुशियाँ अंदर आएगीं।
"राजू, चिंटू,बंटी कहाँ हो सब लोग ?"
सभी दौड़कर घबड़ाए से आते हैं।
"दादी! आपने बुलाया।"
पतंगों को दिखाते हुए
"ये सब क्या है ?"
सभी सिर झुकाए चुपचाप खड़े रहते हैं।
"मैंने सिर झुकाने को नहीं बोला है। कल संक्रान्ति हैं क्या तुम लोगों को पतंग नहीं उड़ानी है ?"
सब आश्चर्य से दादी की ओर देखते हैं। "ऐसे क्या देख रहे हो ? ये लो पैसा जाओ नई पतंगे और मांझा लेकर आओ।"
अब बहुओं को आवाज लगाती है।
"माँजी क्या हुआ ?"
"कल की कोई तैयारी नहीं दिख रही। सब की सब आलसी हो गयीं हैं।" बनावटी गुस्सा दिखाते हुए।
इस बार तिली ,आटे और मूंग के लड्डू के अलावा मूंगफली और सेव की चिक्की भी बनाना है। और हाँ! मेरे लिए अनारसे जरुर बनाना।
" मेरा मुँह क्या देख रही हो ? काम करने का मन नहीं है क्या ?"
सकुचाते हुए "वो बात नहीं है।"
"देखो! जाने वाला तो चला गया और हम सबको भी एक दिन तो जाना ही है। लोकलाज से एक साल का शोक भी मना लिया।"हालांकि बोला तो उनसे भी नहीं जा रहा था पर थोड़ा रुककर बोल उठी
"ऐसे हमें दुखी देखकर क्या वो खुश होंगे ? नहीं न! तो फिर हमें वही पहले वाला खुशियों से भरा घर चाहिए।"
मुस्कुराते हुए "जी माँ जी।"
तभी चहकते हुए नाती बोला "दादी देखो! कितनी सारी पतंगे लाया हूँ।"
"अरे वाह! ये तो बड़ी सुन्दर हैं। देखो इसबार मैं किसी की भी चरखी नहीं पकड़ने वाली। तुम सब अपने-अपने साथी ढूंढ लेना।"
" और दादी राजू से बोलो पतंग कटने पर वह रोएगा नहीं।"
राजू के सिर पर हाथ रखते हुए "अब नहीं रोएगा बड़ा जो हो गया है।"
जाओ! तुम लोग अपनी-अपनी पतंगे और मांझा तैयार करों।"
"किशना ओ किशना "
"जी माँ जी।"
"जा छत की सफाई और धुलाई कर। और हाँ कुछ कुर्सियाँ भी छत पर रख देना।"
किचन से आती खुशबू और बच्चों की हँसी से घर और सत्या का मन दोनों ही खिल उठे।
और सूर्य उत्तरायण हो गया।
मधु जैन जबलपुर