जीवन की भाग दौड़
आर0 के0 लाल
जीवन की भाग दौड़ एवं सब कुछ पाने की आकुलता से परेशान मन जब उचाट हो जाता है तो उसे तलाश होती है एक एकांत की। पर उस एकांत में कदम रखते ही छणिक शांति के बाद फिर ब्याग्रता के अवसाद की घुटन में हम डूबने उतारने लगते हैं।
उस अवस्था में भी मन असीम आनन्द की अनुभूतियों की खोज में कल्पना लोक के अनंत छोर तक आशाओं की भावुक हृदयग्राही एवं रंगीन अंचल का अनुरंजक चित्रण करता है परंतु उन हदभाओ के वास्तविकरण से पूर्व ही सारा संकलन किसी बेजल बादल की चपेट में आकर छिन्न भिन्न हो जाता है। बचता है फिर वही अंधकार।ऐसा बार बार होता हैऔर हम छणिक सुख की आशा में गिरते पड़ते न जाने कब पेट्रोल की तरह उड़ जाते हैं। शायद यही जीवन है।