दरबदर फिरता रहता हूँ तुझे ढूंढने को,
तलाशती हैं नज़रें दूर तलक,
कोई खिड़की कोई दरवाजा ऐसा नहीं दिखता,
जिसमें तेरे अक्स की एक झलक मिल जाए,
रब तू ही बता, तेरे इस सितम की कोई तो वजह होगी,
या तू राह देखता है मेरे क़ाफिर बनने की,
सच कहता हूँ, मेरे सब्र का इम्तिहाँ न ले,
कहीं ऐसा ना हो कि तू भी फिरे एक दिन क़ाफिरों की तरह, फूलों को तरसें तेरी मज़ारें, गुनहगारों की तरह,
तू अपने पत्थर दिल मे कुछ नरमी ला, मुझे मेरे बिछड़े इश्क़ से मिला...