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जागरूक नागरिक
स्टेशन के पास ऑटोरिक्शा के रुकते ही एक २४-२५ साल का युवक जल्दी से कूद के बाहर आ के फटाफट सामान लेकर हाथ मे तैयार रखी ५० रु की नॉट ऑटोवाले को थमाकर छुट्टे की परवा किये बिना आनन-फानन में स्टेशन की और भगा। "काफी देर हो गई, ट्रेन छूट गई तो? टिकिट भी लेना बाकी है।" मन ही मन में बड़बड़ाता है। स्टेशन के मेइन गेट पास पहुंचते ही कांच के गेट से, धीरे धीरे सरक रही ट्रेन दिखती है। दस कदम की दूरी पर टिकिट विन्डो और पंद्रह कदम की दूरी पर उसकी जानेवाली गाड़ी है जो चल पड़ी है! पल, दो पल कुछ सोचता है फिर छूट जाए उससे पहले ट्रेन भाग के ट्रेन पकड़ लेता है। जगह ढूंढ़के बैठता है।
"व्यापारी ने काम निपटा ने में बहुत देर कर दी, फिर भी पहोंच जाऊंगा सोचा था, लेकिन, ये महानगर के ट्रैफिक ने ऐसी कटोकटी खड़ी कर दी।"
बगैर टिकिट के मुसाफरी करने का अफसोस भागती- दौड़ती ट्रेन में बैठे युवक के चहेरे पर थम जाता है।
"टी. सी. आएगा तब टिकिट के पैसे के साथ जो बनेगा वो दंड भी भर दूंगा।"
सोचता है।
एक के बाद एक स्टेशन पीछे छुटते जाते है। पर, टी.सी. नही आता और आखिरी स्टेशन भी आ जाता है। उतरकर टी. सी. कहीं मिल जाए तो टिकिट ले लुं, सोचता है। पर, वहां भी उसे निराशा ही मिलती है। बाहर की और जाते हुए टिकिट काउंटर दिखता है। एक मिनिट कुछ सोचता है, टिकिट काउंटर की और जाता है.. जहाँ से वो आया वहां जाने के लिए ट्रेन तैयार है, टिकिट मिल रहा है.. एक टिकिट खरीदता है। टिकिट के छोटे छोटे टुकड़े कर के कचरा पेटी में डालता है। आराम से धीरे धीरे चलके बाहर आता है। हाथ बताकर ऑटो रोकता है। शांति से सामान रखकर आराम से बैठता है।
उसके मुंह पर सरकारी और आम जनता की संपत्ति के प्रति एक जागरूक नागरिक की प्रतिबद्धता और निष्ठा निभाने का संतोष छलक रहा है।
~आरती राजपोपट