जीवन के कुंद गलियारों में,
मानव को फँसते देखा है।
तनिक तनिक सी बातों पर,
अपनों को रूठते देखा है।
काल चक्र के घटनाक्रम में,
मानवता को मरते देखा है।
जीवन के कुंद गलियारों में,
मानव को फँसते देखा है।
बड़े प्रेम से पाला जिसने,
उन्हें सताते देखा है।
थोड़े-थोड़े धन के खातिर,
भाई-भाई को लढते देखा है।
आधुनिकता के साये में,
जन्मों-जन्म के बन्धन की,
रीत को टूटते देखा है।
जीवन के कुंद गलियारों में,
मानव को फँसते देखा है।
जहाँ भरे पड़े हो वैद्य-चिकित्सक,
आभाव में धन के मानव को,
रोगों से मरते देखा है।
जहां भरे पड़े हो, भण्डार अनाज से,
और फेंका जाता हो खाना।
फिर भी मानव को,
भूख से मरते देखा है।
जीवन के कुंद गलियारों में....