रात
रात बडी सुहानी थी,
वो रात मैं दो दिल तरसे,
आंखो मैं प्यार का समंदर,
मन में सवाल थे,लब्स तो थे
न जाने क्यु दिल मेरे हाथ से निकल रहा!
मुजे तुमसे बेइंतहा इश्क हो गया,
तुमको पाने का जी करता है,
तेरी चाहत मैं रात मुजे रुलाती
न जाने क्यु दिल मेरे हाथ से निकल रहा!
मुजे तुजसे प्यार है, ए हवा इसकी गवा है,
लब्स मैं तेरा ही नाम,ए दिल सबुत है इसका
रात मैं एसा गुफतगु हो,
हमको देखके खुदा भी शर्माते रहै,
न जाने क्यु दिल मेरे हाथ से निकल रहा!
जीवन के मुसाफ़िर प्यार का सफर
साथ कांटेगे,तेरी इजाजत लेनी मुज़े,
न जाने दिल क्यु मेरे हाथ से निकल रहा!
शैमी ओझा "लब्स "