महकने लगा है
फिर से कोई टेसू का फूल
यह ख़ुश्बू
शायद किसी ख़्याल से आई है
लिखते लिखते लफ्ज़
बन गये हैं अफ़साना
उनकी आँखो ने
कुछ बात राज़ की यूँ बताई है
मत देख अब यूँ
निगाहे बचा के मुझको तू
इश्क़ की महक
कब छिपाने से छिप पाई है .........कुछ यूँ ही बैठे ठाले मौसम के नज़ारे :)