गर्व का भाव उस विजय पर जो हमारी सेनाओं ने हासिल की थी, श्रद्धा का भाव उन अमर शहीदों के लिए, जिन्होंने तिरंगे की शान में हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी! आक्रोश का भाव उस दुश्मन के लिए जो अनेकों समझौतों के बावजूद आज तक कई बार हमारी पीठ पीछे छुरा घोंप चुका है!
क्रोध का भाव उस स्वार्थी राजनीति, सत्ता और सिस्टम के लिए जिसका खून अपने ही देश के जवान बेटों की बली के बावजूद नहीं खौलता कि इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाल सकें! बेबसी का भाव उन अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मचलते हृदय के लिए कि क्यों आज तक हम अपनी सीमाओं और अपने सैनिकों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाए?
उस मां के सामने असहाय होने का भाव, जिसने अपने जवान बेटे को तिरंगे में देखकर भी आंसू रोक लिए, क्योंकि उसे अपने बेटे पर अभिमान था कि वह अमर हो गया! उस पिता के लिए निशब्दता और निर्वात का भाव, जो अपने भीतर के खालीपन को लगातार देशाभिमान और गर्व से भरने की कोशिश करता है! उस पत्नी से क्षमा का भाव, जिसके घूंघट में छिपी आंसुओं से भीगी आंखों से आंख मिलाने की हिम्मत आज किसी भी वीर में नही।
स्वतंत्रता का जश्न, वो पल लेकर आता है, जिसमें कुछ पाने की खुशी से अधिक बहुत कुछ खो देने से उपजे खालीपन का एहसास भी होता है, लेकिन इस विजय के 19 सालों बाद आज फिर कश्मीर सुलग रहा है। आज भी कभी हमारे सैनिक सीमा रेखा पर, तो कभी कश्मीर की वादियों में दुश्मन की ज्यादतियों के शिकार हो रहे हैं।
युद्ध में देश की आन-बान और शान के लिए वीरगति को प्राप्त होना एक सैनिक के लिए गर्व का विषय है, लेकिन बिना युद्ध के कभी सोते हुए सैनिकों के कैंप पर हमला, तो कभी आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने ही देशवासियों के हाथों पत्थरबाजी का शिकार होना कहां तक उचित है?
हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे सैनिकों की हैं, जिसे वे बखूबी निभाते भी हैं, लेकिन हमारे सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है। हमारी सरकारें चाहे केंद्र की हो, चाहे राज्य की, क्या वे अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं? अगर हां, तो हमारे सैनिक देश की सीमाओं के भीतर ही वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं? क्या सरकार की जिम्मेदारी खेद व्यक्त कर देने और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने भर से समाप्त हो जाती है? कब तक बेकसूर लोगों की बली ली जाती रहेगी?
समय आ गया है कि कश्मीर में चल रहे इस छद्म युद्ध का पटाक्षेप हो। सालों से सुलगते कश्मीर को अब एक स्थायी हल के द्वारा शांति की तलाश है। जिस दिन कश्मीर के बच्चों के हाथों में पत्थर नहीं लैपटॉप होंगे और कश्मीर का युवा वहां के पर्यटन उद्योग की नींव मजबूत करने में अपना योगदान देकर स्वयं को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा, उस दिन कारगिल शहीदों को हमारे देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।?????????
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