ज़मी से आवाज़ आ रही थी दफन इंसा की, न जाने किस की थी,
जलने के बाद राख से आवाज़ आ रही थी दाह की अगन में जले इंसा की, न जाने किस की थी,
पर 'जय हिंद' शब्द जेसे ही मेरे कानो में सुनाई दिए मुझे यकी हो गया हो न हो ये आवाज़ माँ भारती के सपूत की होनी चाहिए,
वर्ना इस दुनिया से रुख्सद हो ने के बाद,
इतना ज़मी के अंदर गड ने के बाद,
इतनी ज़ुलस्ती आग में ज़ुलस्ने के बाद कौन कह सकता है 'जय हिंद',
और एक बात कोई इस दुनिया से रुख्सद होने के बाद अपनी जन्मदात्री माँ से ज़्यादा प्यार अगर वो माँ भारती से करता हो तो बिना शक के और सबूत के आप कह सकते हो कि वो एक 'सैनिक' ही होगा।
जय हिंद, ✍कुबावत गौरांग