भटक रहे भीड़ मै
एक दूजे को पूछ रहे
देखा क्या तुमने उन्हे
जो कण कण मै है बसे हुए
यह दौड़ रहा सच्चाई से दूर
अपने वेहम का झोला पहनें
बंद आखों को कर अपने
दिखा रहा सूरज को दिए
जान कर अंजान है या
सच ही सच से है बेगाना
मुश्किलें बढ़ाए खुद की
जाने क्यू बेजान सा जिए
मंजिलों से बेखबर
रास्तों का मुकाम है ढूंढे
इस शोर से सन्नाटे का
पैगाम ना ये सुने
रसतो पर रहते है
वो भी तो एक इंसानों है
कुछ रेहम कर उनपे
बनजा उनका भगवान रे
की वजूद तेरा तुझसे पूछे
क्या जी रहा बस मरने को
हे मनुष्य, बन मनुष्य
चल जीवन जीवित हो जिए