जिधर भी देखें, जहां भी जाएँ,
तुझे ढूंढती हैं, ये पागल निगाहें,
समझ में न आये, ये क्या माजरा है,
तुझे पा के दिल में ये खाली सा क्या है,
कहीं से तू आ जा आँखों में तेरी ही,
सूरत बसी है, मैं जिंदा हूँ लेकिन,
कहाँ ज़िन्दगी है मेरी,
ज़िन्दगी न जाने कहाँ खो गयी है.....
रघु शर्मा