इन अनजान राहों पर चलते हुए
बेगानी सी मंज़िल की ओर बढ़ रहा हूँ
कदम कदम पर हौसलों का इम्तिहान दीये
कर्मो के धागों से, जीवन का वस्त्र सी रहा हूँ
रगों से घिरी, बेरंग सी जिंदगी
किताबों में लिखी, सफेद सियाही सी
ख्वाबों के पिछे, आशाओ संग दौडती
रिश्तों के मोती, उसमें पिरो रहा हूँ
कर्मो के धागों से, जीवन का वस्त्र सी रहा हूँ
अभिमान के झुठे चमकते धागे
लालच ओर दिखावे के बेकार सितारे
आलस आराम की डोर कमजोर लागे
साथ इन्हें भी बुने जा रहा हूँ
कर्मो के धागों से, जीवन का वस्त्र सी रहा हूँ
कौन जानता है, और कौन जान पायेगा
कौन से पल का धागा, आखरी हो जाएगा
आलस आराम अभिमान तो छोड़ो
महत्वपूर्ण धागों को भी ना बुन पाएगा
फिर ओढ़े इस वस्त्र को जीवन
जब मृत्यु को गले लगाएगा
वस्त्रो में लगे हुए मोती से ही मनुष्य
मसान की किमत चुका पाएगा
कमजोर होगें धागे जो तब
वस्त्र तिथर बिथर हो जाएगा
दुर से देख हसेगी म्रत्यु
और जिवन भी तब रुलाएगा
इस सत्य से हो वाकिफ़
अब जिवन में जी रहा हूँ
बेरंग ही सही, हौसलों कि जिंदगी
काम आऐ किसी के, कोशिश यही कर रहा हूं
सच्चे कर्मों के धागों से अब मैं
जीवन का वस्त्र सी रहा हूँ