हम उनको क्या दिखाए जिनके आखो पे पट्टी है!
हम उनको क्या समझाए जिनकी सोच ही खोटी है!
कान के है बहरे,और आखो से ये है अंधे !
हम बीन क्यों बजाये जब अक्ल ही मोटी है!
इन्हे क्या समझाए और किस तरह समझाए!
इनके बुधि - विवेक पर तो स्वार्थ की पट्टी है!
जिनके रगों में है बहता ठंठा लाल पानी !
हम उनपे क्या इतराए उम्मीद बेमानी है!
नाले के गंदे कीड़े ये लोभी चतुर सपोले!
उम्मीद क्या लगाये जिनका उतर चूका पानी है!
लाशो के ढेर पर है जो वोटो का फसल उगाते!
बेशर्मी की हद तक जो है नादानी अपनी छिपाते!
एइसे नालायको को जब हम अपना नेता है बनाते!
तो शोक क्यों मनाये ये अपनी कारस्तानी है!
अभी तो बस कुछ हुआ है,बहुत कुछ अभी है बाकि!
हम जैसे कायरो की किस्मत में ही करनी गुलामी है