तुम्हारा चेहरा जैसे हरे पत्तों से ड्रेस पे खिला हुआ गुलाब है
तुम्हारे बाल जैसे भँवरे बनकर गुलाब को घेरे है,
होठ तुम्हारे लगते जैसे पंखुड़िया गुलाब की है,
आंखे मानो खुदा ने काला टिका लगाया है,
की किसीकी नज़र न लग जाये...।
अहा ! क़ातिलाना !
-कृष्ण (क़ातिल)