भारी भरकम मेकअप में तेरी उदासी साफ दिखती है।
लाल चूड़ी कंगन गहनों में तू खिलौने जैसी लगती है।
चुप है क्यों कहती नहीं, क्यों ज़हर के घूंट पी लेती है।
कदर नहीं जज़्बातों जहाँ, क्यों संग उनके तू बैठी है।
तोड़ दे पिंजरा उड़ जा आज , क्यों पर फैलाके बैठी है।
या फिर दिखला दे इनको आज, तू औरत नहीं तू चंडी है।
- महेंद्र प्रेमी। 2.1.2019
उन सभी बहनों को समर्पित जो खुद को मिटाकर उस ससुराल में जी रहीं हैं जहां उनकी कदर नहीं होती।