सुबह तुम्हारी भूल भुलैया, शाम सिसकता सावन है।
मधुशाला के प्याले जैसा झणभंगुर ये मानव जीवन है।
फिर भी न जाने किस कारण अहंकार भरा तन मन है।
क्यों हर पल सबको ऐसा लगता अजर अमर जीवन है।
झूठ फरेब लालच और धोखा बना मन का आभूषण है।
दया,प्रेम ,सौहार्द ,सत्य पहचान बना दुर्बल मन का है।
धनबल के मद से हो मस्त बनी दुर्योधनों की टोली है।
शक्तिबल के मद में चूर रावण और कंशों कि ज़ोड़ी है।
जीने की अब बस एक कला है औरों को मारना सीखो।
दूसरों की खुशियां छिनकर अट्टहास कर हँसना सीखो।
इंसान ही है हैवान बना शैतानों के सिर है ताज सजा।
सत्य हुआ निर्वंश यहाँ, झूठ का चहुँओर राज हुआ।
जाने कब तक घायल धरती यह बोझ उठा पाएगी।
या फिर पाप के बोझ तले पताल में समा जाएगी।