भाषा यहीं की, प्रजा यहीं की
ऐसा मेरा देश हो,
चले चलो, चले चलो
यही प्रबल प्रशस्ति है।
सबल -निर्बल सभी यहाँ
देश का उन्नत मान हैं,
धरा में उत्पन वैभव सारा
हम सब पर उधार है।
किस-किस की प्यास यहाँ
बुझती नहीं है, अमर रही?
कौन ऐसा है यहाँ
जो चलकर थका नहीं,अथक रहा?
अद्भुत तृप्ति के लिए
तीर्थ सारे हम घूमते हैं,
इच्छाओं के दर्पण में
क्षण-क्षण, सौभाग्य हम खोजते हैं।
**महेश रौतेला