हल्की सी बारिश को हो जाने दो
हल्की सी बारिश को हो जाने दो
जमीं हुई है बर्फ,उसे पिघल जाने दो
सूखी है धरती , गर्म सूरज की धूप से
ठंडी फुहार की बूँदें ,उस पर पड़ जाने दो
मिटते हैं फासले कुदरत की चाह से
कुदरत में अब ,खुद को सिमट जाने दो
कहता है दिल ,दिल से ,दिल की बात
दिल से दिल को,अपनी हर बात कहने दो
हो गयी बातें बहुत , शर्मों - लिहाज की
अब इन बात से , पर्दों को हट जाने दो
हो रहें हैं बादल , बरसने को बेताब
धरती को उन्हें ,तृप्त कर जाने दो
न रोको कोई बादल ,फट पड़ेगा वो
बवंडर को किसी अब टल जाने दो
सुरेंद्र कुमार अरोड़ा