आज मैंने सोचा
कविता, कहानी, उपन्यास न पढ़ूं
बल्कि शिशु के साथ खेल लूँ
आसमान के कुछ तारे गिन लूं
घर की साफ सफाई कर
दूर तक टहल आऊं,
पेड़ के लिये पानी ले आऊं
जंगलों की उपयोगिता जान लूं,
किसी से पूछ लूं
कैसे हो?
किसी से जान लूं
कहाँ जा रहे हो?
किसी से इधर उधर की बात कह
मन को हल्का कर लूं,
बारिश में भीग
बर्फ में सिहर
हवाओं से परिचित हो
नदियों से बातचीत कर लूँ,
देवताओं की भूमिकाओं को
समझ लूं,जान लूं,
देश से जो अच्छा भला मिट गया है
उसे ले आऊं।
गरीब की थोड़ी गरीबी ले लूं
अमीर से मुट्ठी भर अमीरी पा लूं
एक चिट्ठी ईश्वर को लिख
उत्तर की प्रतीक्षा करूँ।
** महेश रौतेला