कितने मन के घाव घने हैं, कितनी दबी हुई अभिलाषा,
दर्द छुपा है होठों पर मेरे क्या अनुभव कर पाओगे?
बीती घुटन भरी घड़ियों की क्या वेदना सुन पाओगे?
कैसे दर्द दिखाऊं अपना समझ नहीं तुम पाओगे,।।
बीती स्मृतियों से तो मैं कुछ अपना पन खुद पा लूंगी,
सारे दुख तुम्हारे अपने मन में आज समा लूंगी
मधुरिम बातें मधुर पलों की क्या विस्मित कर पाओगे? कैसे दर्द दिखाऊंअपना समझ नहीं तुम पाओगे।।