#हिंदी शायरी प्रतियोगिता
कब भरेंगे ये अछूते घाव ?
... कब से धागों से दर्द को सिल रही हूं !
कब थमेंगी ये शबनम की सिसकियां ?
...कब से कलियों को औस पे बिखैर रही हूं !!
कब तप के निखरेंगी ये वफा ?
...कब से धूप में वफा को सेंक रही हूं !
कब पिघलेंगे पत्थर मोहब्बत की तपिश से ?
...कब से ख्वाहिशों कि आग सिरहाने रख सो रही हूं !!
कब गूंजेगी जोर से खामोशियां ?
...कब से मौन के संवाद ढो रही हूं !
कब न जाने उगेगा पैड रोशनी का
...कब से घर पे चांदनी बो रही हूं !!