ग़ज़ल
साथ मेरे न वो कारवाँ रह गया,
तिश्नगी से भरा ये जहाँ रह गया।
चेहरे की मेरे सिलवटें बढ़ गई,
पर ये दिल तो जवाँ था जवाँ रह गया।
है अदावत मगर आके तू देख ले,
तेरे बिन मेरा घर भी मकाँ रह गया।
साँस तो चल रही ज़िन्दगी थम गई,
मेरे इस जिस्म में दिल कहाँ रह गया।
जाने कैसा नशा है तेरे शहर में,
आया जो भी यहाँ बस यहाँ रह गया।
कोशिशें लाख कर ली मिटा दें मगर,
फ़ासला जो भी था दरमियाँ रह गया।
इस जमीं पे तो मज़हबगिरी छा गई,
अब तो बाकी ये 'रण' आसमाँ रह गया।
पूर्णतया स्वरचित व स्वप्रमाणित
सर्वाधिकार सुरक्षित
अंशुल पाल 'रण'
जीरकपुर, मोहाली(पंजाब)