शंख नाद
बजा फिर शंख सत्ताधारियों का
कौन जीतेगा ?कौन हारेगा?
जिंदगी देगा कौन हमको?
कौन जीतेजी ही मारेगा ?
पुराने कांच के वादे
मिटाकर नये गढ़े होंगे।
किसी मजबूर के सपने
पेपरों में ,औंधे मुंह पड़े होंगे।
उठायेगा कौन बंदूकें?
कौन गांधी वेश धारेगा?
बजा फिर शंख सत्ताधारियों का
कौन जीतेगा कौन हारेगा?
अब तक इस कुर्सी के मद में
जाने कितने लड़े होंगे।
कोई बनकर अटल तो कोई
इंदिरा बनकर खड़े होंगे।
हमें मतलब किनारे से ,
कौन डुबोएगा? कौन तारेगा ?
बजा फिर शंख सत्ताधारियों का
कौन जीतेगा कौन हारेगा।
जिंदगी............ मारेगा।
सीमा शिवहरे" सुमन"