टूटे अहं का भाव जन में ,संकल्प सिंचित ज्ञान हो,
होवे सफल जीवन सभी का, अनहद सरस संगीत हो।
हे करुणानिधे! अंतः करण से गहन तम हर लीजिए।।
ऋण उतारे इस धरा का,आत्मदोषों को निहारे,
मनु धीर हो, गंभीर हो, विचलित न हो संसार में
विवेक दीपक जल उठे,प्रभु ज्ञान प्रज्ञा दीजिए।।
आकंठ तक डूबे हैं,हम सब पाप औ दुष्कर्म में,
हे प्रभु उद्धार होगा सभी का तेरे चरण स्पर्श से
पा सके दर्शन सभी चक्षु ज्ञान प्रज्ञा ऐसी दीजिए।।