शरद पूर्णिमा का महत्व का महत्व प्राचीन काल से रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसदिन धन की देवी मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई थीं। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा की रात में धवल चांदी में महारास का आयोजन किया था।
बिहार और पश्चिम बंगाल में इस व्रत को कोजागरा व्रत कहा जाता है। इसका अर्थ होता है ‘कौन जाग रहा है।’ कहते हैं कि लक्ष्मी माता यह देखती हैं कि कौन जाग रहा है और जो जाग रहा होता है, मां लक्ष्मी उनके घर में प्रवेश करती हैं और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।
इस रात में कौड़ी खेलने की भी प्रथा है। कौड़ी मां लक्ष्मी को प्रिय हैं। इसलिए मां लक्ष्मी की पूजा करते समय उन्हें कौड़ी भी अर्पित की जाती हैं। इसके पीछे वजह यह है कि कौड़ी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण देवी लक्ष्मी का भाई माना जाता है।
शास्त्रों के अनुसार, देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा तिथि पर ही हुआ था। इस रात में वह अपने वाहन पर सवार होकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आती हैं। शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा सोलह कलाओं में चमकता है और पूरी रात अपनी धवल चांदनी से पृथ्वी को रोशन रखता है।
मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात में चंद्रमा की शीतल चांदनी के साथ ही आसमान से अमृत वर्षा होती है। इसीलिए इस दिन खीर बनाकर रात में उसे चंद्रमा की रौशनी में रखा जाता है। साथ ही मिट्टी के कलश या करवे में पानी भरकर छत पर रखते हैं और अगले दिन आयोग्य प्राप्ति की कामना के साथ इस जल से स्नान करते हैं।