इस रंग बदलती दुनिया में मेरी अपनी पहचान कहाँ ,
गिरगिट खुद को इन्शान कहें तो मैं ऐसा इन्शान कहाँ ।
खाली कर दूं उसके दिल को , उससे नाता तोड़ चलूँ ,
मैं भी तोडूं वादे , कसमें , मैं इतना भी बेईमान कहाँ ।।
इस रंग बदलती दुनिया में मेरी अपनी पहचान कहाँ…………
तरह-तरह की शक्लें उनकी , तरह-तरह की बोली हैं ,
अपने-अपने घर उन सबके , अपनी-अपनी टोली हैं ।
फिर भी लगते हैं अपने से , मन में हंसी-ठिठोली है ,
उनसे नाता रखने में फिर , अपना कोई नुकसान कहाँ ।।
इस रंग बदलती दुनिया में मेरी अपनी पहचान कहाँ……………