Hindi Quote in Shayri by Robin Rajput

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कब चाहा ...

चाह नही भाग्य से ऐसा लेख ,

वसुदेव सा हो मेरा वंश नेक

वासुदेव तुम हो,मेरे अंश एक'

और आह्लादित होऊं ,तुम्हे देख।

बस तकती हूँ राह तुम्हारी ,

बंदीगृह सी आस लिए '

खुल जाएंगे बंधन तब,

आओगे जब तुम पास प्रिय ।



नंदबाबा सा हो आँगन मेरा ,

और तुम उसमे पलने आओ,

कब चाहा मैंने ,शिशु लीला

से अपनी मन को मेरे छल के जाओ ।

बस तकती हूँ राह तुम्हारी ,

वन मयूर सी आस लिए ,

आओगे तुम गईया के संग ,

होता है ऐसा आभास प्रिय ।



कब चाहा यशोदा बन

लोरी मैं भी गए पाती,

मेरे आँचल की छाँव तुम्हें

सबसे ज्यादा भा जाती |

बस तकती हूँ राह तुम्हारी

कदम्ब सा मैं विश्वास लिए

बैठ मेरी इक डाल पर

लोगे तुम कुछ श्वास प्रिय |



कब चाहा मैंने कान्हा ,

बलदाऊ सी मैं बड़ी हो जाऊं ,

जाओ तुम जिस ओर भी

रक्षा में तुम्हारी खडी होजाऊं |

मर मर कर जीती हूँ

जैसे कोई कंस जिए,

उड़ जाउंगी देख तुम्हे

एक दिन बन हंस प्रिय |



रुक्मिणी सा हो भाग्य मेरा

और उसपर मैं इतराऊं;



बस तकती हूँ राह तुम्हारी

सुदामा सी मैं आस लिए ,

कभी कराओगे मुझको भोजन

बिठा अपने पास प्रिय |
Robin rajput

Hindi Shayri by Robin Rajput : 111034902
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