#kavyotsav (कविता)
जुबां खामोश रहती है,दिल बेजान सा लगता है,
न जाने क्यों मेरा ही साया मुझे अनजान सा लगता है।।
ऐसा नहीं कि बेचैन हम पहली दफा हो, पर क्यों अबकी बार ये दिल कुछ ज्यादा परेशान सा लगता है।।
हर रोज मिलते हैं, यूं तो कई लोग से हम दिखता तो मेला
है, पर वीरान सा लगता है ।।
गुजरी है वैसे तो जिंदगी हमारी तन्हाइयों में ही पर क्या बात है कि, घर मेरा अब शमशान सा लगता है।।
न जाने क्यों मेरा साया मुझे अनजान सा लगता है।।
विनीता..... ✍️