Hindi Quote in Shayri by Sudhir bamola

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गोपियों की विरह

मन मोह लिया तन मोह लिया।
मन भावन मोहन ने अब तो ।।

बिसराय दियो जग चेतन खो।
जब लागि मनोहर से मन लौ।।

हिय भेद दिया कज नैनन ने।
सुधि नाय रही अब चेतन में।।

अब चैन न आवत है मन को।
कछु सूझ न पावत है हम को।।

सब सूझ लगा हम रेहन में।
अब नींद कहाँ रह नैनन में।।

कछु बोल सखी अब माधव से।
उसको बुलवा जिस साधन से।।

मन लागत रास रचावन में।
अब तो न लगे चित सावन में।।

समझाय रही सब आपस में।
सब गोपन की रह बैठक में।।

सुन प्रीत लगी जब से मुझको।
किसना बन घूम रही वन को।।

धर रूप मनोहर का चलती।
मनमोहन की मुरली बनती।।

तज लाज नटी बनती फिरती।
जब मोर शिखा सर पे धरती।।

झलकी- झलकी फिरती वन में।
नट नागर को भरती मन में।

नट नागर से जब प्रीत लगी।
स्व से स्व की तब भेंट हुई।।

बिरहा अब छोड़ सखी मन से।
अब केशव तू बन जा तन से।।

अब जाग सुधी रख तू मन में।
दिख जाय मनोहर चेतन में।।

सुधीर बमोला

Hindi Shayri by Sudhir bamola : 111034348
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