#काव्योत्सव
इत्र जो इतना महकाये है
नाजाने कोइ गंध छुपाए हो
आज सफ़ेदपोश फिरते हो
नाजाने कोइ दाग धो आए हो
लोग तो देखके पहचानेंगे
नाजाने कोइ थाप तो खाए हो
खेर! अकेले से फिरे जाते हो
नाजाने कितने आजमाये हो
दो कदमों के ही फासले हे
नाजाने काफीही थकेहारे हो
आंख उठा के नही देखते
नाजाने कोइ बात छिपाये हो
मान लो देवांग के मस्वरे
आ जाते क्युं बने पराये हो ।।