# kavyotsav पत्थर
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ज़माने ने जो पत्थर मारे ,
समेटकर कल्पनाओं में सजा लिया।
दोस्तों मैं तो बेआसरा थी ,
उन पत्थरों से आशियाना बना लिया।
ज़माने ने जो पत्थर मारे,
जोड़कर हद ए दायरा बना लिया।
अपनी तन्हाइयों व ज़माने के लिए ,
उन पत्थरों से दीवारें दरम्याना बना लिया।
ज़माने ने जो पत्थर मारे,
इकट्ठे कर करीने से जमा लिया।
दिल ए इबादत व ख़ुदा के बीच ,
उन पत्थरों से पुल दरम्याना बना लिया।
ज़माने ने जो पत्थर मारे,
तराशकर उनसे मुज़स्समा बना लिया ।
श्रद्धा से मंदिर में उसे विराजा ,
भक्तों को मैंने पत्थरों का दीवाना बना दिया।
विनीता सिंह चौहान
इंदौर मध्यप्रदेश
स्वरचित मौलिक सर्वाधिकार सुरक्षित रचना
मोबाइल नंबर 9424512974