Quotes by Digvijay Singh Rathore in Bitesapp read free

Digvijay Singh Rathore

Digvijay Singh Rathore

@digvijaysinghrathore332439
(438)

मानव और शक्ति

मानव पुरुषार्थ एक खिलौना है,
शिव सी इसमें शक्तियां हैं,
डूबे तो नटराज बन जाता,
रूठे तो मसान है।

प्रेम में खिले तो कमल कृष्ण हैं,
धिक्कारने पर मरुस्थल का फूल हैं।

सहारे में दिगंबर है, उत्थान में बुद्ध,
आतंकित हो तो मानव विस्फोटक,
अभय खिले तो कृष्णमूर्ति सा शुद्ध।

शक्ति का पुंज है, हवा मिले तो
जंगल भभक उठे, सही पर दीपक बने;
अहम में रावण उभर आता है,
शांति में राम निखर आते हैं।

हृदय लगाने पर मोम सा पिघलता है,
खोए को पाने में मांझी सा बनता है।

मानव शक्ति मेरे महबूब सी है,
मिले तो दामन थाम ले, न मिले
तो दामन दहन कर देता है।

मानव पुरुषार्थ एक खिलौना है,
अपने धैर्य से इमारतें बुनता है,
फिर खुद ही भटक कर आग लगाता है।

अपनी पसंद पर रांझा बन जाता है,
बिछड़न में देवदास खाक हो जाता है।

अनेकों गुलाबों की क्यारियां बोता है,
पानी देता है, सींचता है,
फिर डायनामाइट से सब उड़ाता है।

सर्वत्र उसी से मिला है सब कुछ—
शक्ति, प्रेम, वीर्य, सौंदर्य, संगठन,
शांति, भक्ति, विश्वास, पौरुष, ज्ञान;
सबकुछ मानव शक्ति में झलकता है।

©DSR

Read More

अम्मा-पत्नी

जब अम्मा कहीं जाती,
पत्नी प्रसन्न हो जाती,
कभी पत्नी पीहर जाती,
अम्मा खुश नज़र आती।

दोनों दो ध्रुवों पर खड़ी दिखतीं,
दोनों ही खूब कट-कट करतीं,
एक पुरोधा है अपने समय की,
एक उसी दौर से गुजरने वाली।

तब भी बड़ा अंतर मन के पाट में,
कैसे-कैसे द्वंद्व खिंचे अनुपस्थिति में।
जन्म और प्रेम तले दबे अपनेपन पर,
अधिकार जतलातीं, अपने पाले में समेटतीं।

अम्मा तो अम्मा जिसने पौधा रोपा है,
पत्नी भी कम नहीं जिससे यह पौधा जुड़ा है।
हर रोज़ फाटक पर उतरता एक चेहरा,
कोई न कोई कन्नी किसी से काटता फिरता।

सुलह कठिन जब बरसे दोनों मुझ पर,
दो धाराएँ विद्युत की गिरें साथ मुझ पर।
जो घाव भर नहीं सकते मरहम से,
अम्मा दे जाती बंद सांसें मौन रहके।

पुरोधा निभा गई अपना वादा हमसे,
कभी ग़म तले, खुशियों में मुस्कुराते हमसे।
विदा यूँ ली, देर रात जोड़ रहे थे टूटे बदन को,
अँधेरे में वो सुन्न रही, ख़्वाब बन गुज़र गई सवेरे।

पत्नी अब उसी धुरी की पुरोधा है हममें,
हर बात में दिखती हल्की झलक अम्मा की उसमें।

Read More

इस्पात की आवाज़

तितलियाँ उसके गालों पर मँडराती,
जैसे मँडराती वे सरसों के फूलों पर।
पंखों से हवा में तैरती, चूमती बदन,
तैरते चुराती हैं हृदय और फूलों से रस।
मार बड़ी सावधानी से मारती, उड़कर
फ़िज़ा में उड़ाती महक, देती छाँव शीतल।
मुस्कान मीठी सी खिलखिलाती छुपाती
हाथों को मुख पर रख सदैव नाक चिढ़ाती।
घने बादल घिर आते, माहौल मलमली
ताड़क उसके अढंगे रूप से रूबरू करवाती।
जलन वायु दुपट्टे को उड़ाती, मुखौटा हटाती
समेटे स्वयं को नौजवान बाला अष्टावक्र सी
उससे ही ज्ञान, व्यवहार सी, फिर से चहकती।
मान में सागर सी दृढ़, शिथिल में मोम,
हाथों के स्पर्श में आटे सी गुड़िया के मेल
नथनी मादक घोले मन-मंदिर पट खोलते।
मिलने उँगलियाँ बढ़ीं छूने स्वयं सा अन्य रूप
इस्पात की छड़ें हिलीं, टक की आवाज़ गूँजी,
हैरत ताकती निगाहें लड़ीं, बूँदें रीसी तरंगिनी।
मिलने उठी ताकत झोंककर, बाला बल पकड़कर
इस्पात फिर टकराया, नींव बजी उसे छूकर
वह मुस्कुराई—सौंदर्य महबूब मेरे, तुम कागज़ भरो बैठकर।
©DSR

Read More

शब्दों की तलवार

काँटों के शूल में खिले, पले
गुलाब पनपे, उपजे, मुस्कुराए
ढेरों गुलाबों के ढेर में अनेकों
कलियाँ मुरझाई
पार्थिव शहीदों के बिछौने में
सिलवट मिटाई
घावों के निशानों में लहू के सुराखों
में मलमल अहसास दिलाए।
मिट्टी कब्रों की उफन पड़ी, कोख में लेने
टूटी हड्डियाँ, बची खोपड़ियाँ
अंतिम दर्शन, साथ लेने बाहर आई
उदास चेहरों ने गुलाब उड़ाए
विदा दी वीरों को, माटी सिर लगाई।
दूर-दराज के ज्ञाताओं ने
फूलों का शोषण और हड्डियों
पर ज़ुल्म के शब्द कसे
लंबी साँसें खींची,
फ़ोन खोला और लाइक्स गिने।
©DSR

Read More

दूध की हल्की महक

गुलाब के गले लगे,
अब उसी में लिपटकर
महकते जा रहे,
अंजुली की बूंदों से सींचे
उन्हीं से अमृत पा रहे।
पलके थाम देखते तारे को
दिनों-दिन, तीज-त्योहार
अब साज में सितारे फलक जा रहे।
किवाड़ की कुंडीयाँ दस्तक देतीं,
मौन हेतु शांति से विदा पा रहे।
फूलों के टुकड़े बदन पर मलते,
घी से वे अब नहलाते जा रहे।
हिना फबे, चूड़ियों की खनक सुनाते
वे मूक से कंधा दिए चले जा रहे।
शहर गुलाबी हुआ करते थे,
वो मुट्ठियों से राय उड़ाते जा रहे।
रंगीन फ्रेम में कसके पकड़े हैं,
दो हंसों का जोड़ा,
उस पर माला चढ़ाते जा रहे।
हल्की महक है, दूध में तेरे
सामने जलते लोबान, बत्तियों से
वही महक सभी पा रहे।
हाँ, गुलाब के गले लगे,
अब उसी में लिपटकर
महकते जा रहे।
©DSR

Read More

Happy Independence Day to All the People of India. 🇮🇳

And Especially to those who believe this country become a Gas Chamber. Intolerence. Psuedo successer. Hatred. Genoside Spot. One side viewer. A puppet of US. Bankcurracy of Intelligence.

पुराने बटन-

नया शूट बनवाया,

महँगा चीर खरीदा,

कॉलर, आस्तीन,

फिटिंग और पुराने

बटन जोड़ी में टंकवाए।

स्मृतियों के पटल पर

कांच के इस बटन पर

दिए वचनों के साथ-साथ

छूते मचलता अहसास साथ।

उसके धीर का तोड़ कहाँ?

नए मकान में पुराने फाटक

जोड़े, अब वो रातरानी कहाँ?

नए वादों में पुराना फसाना,

समांतर सींचे प्रियतमा अब कहाँ?

उजड़ते पल भर में रिश्ते,

सालों संजोए महबूब न्यारे!

माथे के बल भूलते पहचाने,

मस्तिष्क पुष्पवान रोज़ पुकारे।

हवा ने सब कुछ बिगाड़ डाला,

देवता का पुष्प मुझ आ बरसा।

संभवतः उसने पुकारा बुलाया,

कोई मेरे कानों में फुसफुसाया है।

हाँ, उसने मुझे दीदार पर बुलाया है।

©DSR

Read More

यत्र तत्र सर्वत्र

गर्म हवा मुल्क को लील रही,
नवीन सोच को झुलसा रही।
कई दूरियाँ पट रही, उभर रही,
मानवता दिन-दिन तिल हो रही।

झगड़ों का अंबार है, झंडों की गुलामी,
एक नई नफ़रत लहू में उबाल मार रही।
अनगिनत मंदिर हैं, अनगिनत मस्जिद,
प्रेम सिकुड़ रहा, झूठा राष्ट्रवाद उफ़न रहा।

कागज़ पर सब चंगा दिखता, मीठी स्याही,
ग़ौर से सूंघने पर स्याही रक्त सी तप रही।
फ़िज़ा का धर्म नहीं कोई, न कोई सरहदें,
क्यों ख़ुद को हम क़ैद में घुटते जा रहे हैं।

आतंक के बलबूते बेगुनाहों को सताते,
मज़लूमों को रगड़ते, अपने लफ़्ज़ बुलवाते।
जेबें सरेआम काटी जाती, क़ानून में फँसाते,
भावनाएँ आहत होतीं, बस्ती जलाई जाती।

आलम है न्याय का मेरे महबूब सा रिश्ता,
आज ग़लत, कल का सही, परसों कोई नया।
मरे हुओं को मौत आ जाती दुबारा हुज़ूर मेरे,
आते-आते आदेश, आधा इंसान बनता मूर्ति मेरे।

दो मुल्कों के नासूर रोग से पीड़ित है सब यहाँ,
कभी फटे बम यहाँ, कभी फटे मिसाइलें वहाँ।
बच्चे मरते कूड़ा बीनते, घुट-घुट अदना मरता,
मरती शबनम, मरती मीरा, प्रेम हृदय दफ़नाता।

पूर्वज ताड़ पे लिखते, उंगलियों से रटते जाते,
कल भी क़लम बेबस, वर्तमान दोहराता दिखता।

Read More

शिवम् गंगा-

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

विशाल भू-भागों में,

मंदिरों की प्रार्थनाओं,

अगरबत्तियों, दीपकों

से उठते प्रकाश और धुएँ के बीच,

जब देवियाँ आँखें मूँदती हैं,

अनेकों अनजानी कलियाँ

घुटकर अपनी साँसें गिनती हैं।

गंगा लाश खींचती है पापियों की,

साधु की और अपने शोषितों की।

काँटे जितने शिव के धतूरे में,

उससे अधिक उसे सौंपने वालों में।

रंग-भेद, नस्लीय भेद, हीन, अपंग

सब डोलते हैं एक समान आँगन में।

अपने हृदय में ढोंग पिरोते, झूठ रचते,

मायावी चारों ओर हालाहल बाँटते हैं।

अनेकों रेखाएँ मानचित्र में ढेरों उलझी हैं,

उससे अधिक दिमाग पे उभरती दिखती हैं।

शत्रु सब हैं यहाँ, मित्र कोई नहीं है यहाँ,

भोग की शुरुआत यहाँ, मुक्ति मुक्त है यहाँ।

आदर्शों की पंक्तियाँ मंदिरों में छपी यहाँ,

दुख-दुख जोड़े, सुख बाँटे—लिखित यहाँ।

बीहड़ों, जंगलों, कस्बों, शहरों,

गाँवों, नदियों के तट पर

©DSR

Read More

निजी स्वार्थ-

मैं शहद बोलता हूँ,

ज़रा ओट लिए छानता,

तुला तोलता फिर बोलता हूँ।

उपस्थित दूत भी हूँ, टुकुरता—

मसका लगाए दिखता,

अंतर्मन में चयनता फेरता।

कितना वक्त खाएगा?

मैं इससे क्या पाऊंगा?

कुछ मांगने आया होगा?

हाँ, पिछला बकाया है,

शायद अदा करने आया है?

सवाल-मंथन रुकता, जब

निजी स्वार्थ इशारों में फूटता है।

वह अपनी कलाई खोलता,

मैं अपनी उसे दिखाता हूँ।

हाथों से उपहार बदलते,

बड़े नयनों से तसल्ली करते,

तब लफ़्ज़ों की चहक फोड़ते।

©DSR

Read More