शब्दों की तलवार
काँटों के शूल में खिले, पले
गुलाब पनपे, उपजे, मुस्कुराए
ढेरों गुलाबों के ढेर में अनेकों
कलियाँ मुरझाई
पार्थिव शहीदों के बिछौने में
सिलवट मिटाई
घावों के निशानों में लहू के सुराखों
में मलमल अहसास दिलाए।
मिट्टी कब्रों की उफन पड़ी, कोख में लेने
टूटी हड्डियाँ, बची खोपड़ियाँ
अंतिम दर्शन, साथ लेने बाहर आई
उदास चेहरों ने गुलाब उड़ाए
विदा दी वीरों को, माटी सिर लगाई।
दूर-दराज के ज्ञाताओं ने
फूलों का शोषण और हड्डियों
पर ज़ुल्म के शब्द कसे
लंबी साँसें खींची,
फ़ोन खोला और लाइक्स गिने।
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