मानव और शक्ति
मानव पुरुषार्थ एक खिलौना है,
शिव सी इसमें शक्तियां हैं,
डूबे तो नटराज बन जाता,
रूठे तो मसान है।
प्रेम में खिले तो कमल कृष्ण हैं,
धिक्कारने पर मरुस्थल का फूल हैं।
सहारे में दिगंबर है, उत्थान में बुद्ध,
आतंकित हो तो मानव विस्फोटक,
अभय खिले तो कृष्णमूर्ति सा शुद्ध।
शक्ति का पुंज है, हवा मिले तो
जंगल भभक उठे, सही पर दीपक बने;
अहम में रावण उभर आता है,
शांति में राम निखर आते हैं।
हृदय लगाने पर मोम सा पिघलता है,
खोए को पाने में मांझी सा बनता है।
मानव शक्ति मेरे महबूब सी है,
मिले तो दामन थाम ले, न मिले
तो दामन दहन कर देता है।
मानव पुरुषार्थ एक खिलौना है,
अपने धैर्य से इमारतें बुनता है,
फिर खुद ही भटक कर आग लगाता है।
अपनी पसंद पर रांझा बन जाता है,
बिछड़न में देवदास खाक हो जाता है।
अनेकों गुलाबों की क्यारियां बोता है,
पानी देता है, सींचता है,
फिर डायनामाइट से सब उड़ाता है।
सर्वत्र उसी से मिला है सब कुछ—
शक्ति, प्रेम, वीर्य, सौंदर्य, संगठन,
शांति, भक्ति, विश्वास, पौरुष, ज्ञान;
सबकुछ मानव शक्ति में झलकता है।
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