Ishq Aur Ashq - 77 in Hindi Love Stories by Aradhana books and stories PDF | इश्क और अश्क - 77

Featured Books
  • 11 ટાસ્ક્સ - Chapter 43

    વર્તમાન:આશુતોષ આજે વહેલો ઑફિસેથી ઘરે આવી ગયો હતો. અનન્યા સાથ...

  • મારો માધવ

    મારા માધવ એટલે ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ.મારા માટે માધવ માત્ર એક ભગવાન...

  • આદમખોરનું રહસ્ય : પ્રકરણ ૫

    આદમખોરનું રહસ્ય પ્રકરણ ૫: ઈવા અને પ્રાણી-મનોવિજ્ઞાનલેપટોપની...

  • રોકાણ - 6

    ભાગ ૬ — વધતું બેંક બેલેન્સકાશીની યાત્રા પૂરી કરીને રમેશભાઈ,...

  • શૂન્યની બહાર - 12

    ભાગ 12 — દરવાજાની બીજી બાજુ“આરવ... દરવાજો ખોલ.”બહારથી ફરી એ...

Categories
Share

इश्क और अश्क - 77

गरुड़ लोक में शाम उतर रही थी।
सुनहरी रोशनी धीरे धीरे फीकी पड़ रही थी — आसमान में बादल थे — गहरे, भारी।


जैसे कुछ आने वाला हो।वर्धान अपने कक्ष की खिड़की के पास खड़ा था।नदी किनारे का वो लम्हा अभी भी दिल में था

— प्रणाली का चेहरा, उसकी आवाज़, उसकी भीगी आँखें।"एक बार बता दो कि तुम ठीक हो।


"उसने आँखें बंद कर लीं।जाना ही था उसे। यही सही था।तभी —बाहर से एक आवाज़ आई।गरुड़ों का कोलाहल।



पंखों की फड़फड़ाहट। और फिर — सब शांत।वर्धान ने आँखें खोलीं।कुछ था — हवा में। एक अजीब सी भारीपन। जैसे तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी।

वो कक्ष से बाहर निकला।राजमहल के प्रवेश द्वार पर —एक आकृति खड़ी थी।

लंबी। शांत। और उस शांति में एक खतरा था — जो महसूस होता था पर दिखता नहीं था।वो आकृति मुड़ी —और मुस्कुराई।

"प्रणाम... बड़े भैया।"वर्धान सन्न हो गया।

कनिष्क।वही चेहरा। वही हरी आँखें — तेज़, शातिर, गहरी।


जिनमें हमेशा कुछ छुपा रहता था।

जिन्हें देखकर बचपन से एक बेचैनी होती थी।

"तुम।" — वर्धान की आवाज़ शांत थी — पर भीतर कुछ हिल गया था।

"तुम तो पाताल लोक में थे।" उसने कहा — "क्रोध और आवेग पर संयम साधने के लिए तप कर रहे थे।

"कनिष्क ने सिर झुकाया — विनम्रता से।

पर आँखों में विनम्रता नहीं थी।


"हाँ बड़े भैया... वो तो हो गया।

वो एक कदम आगे आया — धीरे से।इत्मीनान से। जैसे यह जगह उसकी हो।


......पर जब मेरे बड़े भाई ने इतना बड़ा काम कर दिया..."उसकी आँखों में एक चमक आई. "...धरती पर उस ब्रह्मवर्धनी की शक्तियाँ छीन लीं... तो मुझे आना ही था।

"उसने हाथ जोड़े —"बधाई देने के लिए ।


"तभी पीछे से क़दमों की आवाज़ आई।


गरुड़ शोभित।वो रुके.....।कनिष्क को देखा — एक पल के लिए उनके चेहरे पर कुछ काँपा। एक झिझक। ।पर फिर उन्होंने खुद को संभाला।


"कनिष्क।" — उनकी आवाज़ शांत थी।


"तुम यहाँ ho

""चाचाजी।" — कनिष्क ने झुककर प्रणाम किया।

"भीतर चलो।"कक्ष में तीनों थे।

गरुड़ शोभित ने एक नज़र कनिष्क पर डाली — और फिर वर्धान की तरफ मुड़े।


(कनिष्क बचपन से ही गुस्सैल है, वो समझ रहे थे कि कनिष्क वर्धान के राजा बनने से खुश नहीं है ।)

उन्होंने बात को संभालने की कोशिश की:
तुम्हारे पूर्वज ने जो किया — वो उनकी भूल थी। उन्होंने एक ब्रह्मवर्धनी को प्रेम जाल में फँसाया। उसकी शक्तियाँ त्यागवाईं। और उस पाप के बोझ तले — वो खुद टूट गए।

"कक्ष में ख़ामोशी थी।"उन्होंने आत्मदाह किया — क्योंकि वो उस guilt से बाहर नहीं आ सके। और जाते जाते — यह कामना की कि उनके किसी वंशज को यह पाप न करना पड़े।


"शोभित की आवाज़ भारी थी —"इसीलिए गरुड़ लोक का राज्य हमारे पूर्वजों को सौंपा गया। यह दंड नहीं था कनिष्क — यह एक नई शुरुआत थी।


कनिष्क की आँखें — वो हरी, तेज़ आँखें — एक पल के लिए कहीं खो गईं।

फिर वापस आया ।और उनमें वही था — वही पुरानी आग।


"नई शुरुआत.....? — उसने दोहराया — धीरे से। जैसे यह शब्द उसे हँसा रहे हों।


"चाचाजी... जो राज्य पीढ़ियों से हमारा था — वो एक भूल की सज़ा में चला गया।

""मैं उसे भूल नहीं कह सकता।"

वर्धान ने उसे देखा —


गरुड़ शोभित गर्व से बोले —"और वर्धान को देखो — इसने वो काम किया जो सदियों से अधूरा था।

शक्तियाँ भी छीन लीं... और उस ब्रह्मवर्धनी को कुछ हुआ भी नहीं।"उन्होंने संतोष से सिर हिलाया —"यही तो एक कुशल गरुड़ की पहचान है।


"कनिष्क ने सुना — चुपचाप।

शोभित आगे बोले —"पहले तुम्हारे पूर्वज ने शक्तियाँ त्यागवाईं — तो वो ब्रह्मवर्धनी जीवित नहीं बची। पर वर्धान ने वही काम इस तरह किया कि वो ब्रह्मवर्धनी सुरक्षित भी रही।


"वो मुस्कुराए —"यही फ़र्क है

"कक्ष में एक पल की ख़ामोशी रही।

और फिर —कनिष्क ने — बहुत धीरे से  जैसे बस यूँ ही पूछ रहा हो :—"हाँ... वैसे उस ब्रह्मवर्धनी का नाम क्या है?

"एक पल।"

प्रणाली है न उसका...?"कक्ष में जैसे हवा थम गई।


वर्धान की आँखें —सफ़ेद पड़ गईं।एक पल के लिए — साँस रुक गई। दिल रुक गया।वो जानता है।

वो उसका नाम जानता है। ( वर्धान गहरी सोच में)


कनिष्क की हरी आँखें उसी पर टिकी थीं — उस मुस्कान में अब कोई मिठास नहीं थी।सिर्फ एक चेतावनी थी।

वर्धान ने अपनी मुट्ठी भींच ली।


वर्धान: "कनिष्क....! — आवाज़ शांत थी — पर उसमें एक चेतावनी थी — "तुम यहाँ किसलिए आए हो — सच बताओ।

"कनिष्क ने एक पल उसे देखा।

फिर झुककर प्रणाम किया —"बड़े भैया... मैंने कहा न।""बस बधाई देने आया था ।

"और मुड़ गया।वर्धान वहीं खड़ा रहा।उसकी पीठ देखता रहा — जब तक वो दिखी।और जब वो ओझल हो गया —

वर्धान के मन में वो डर —और गहरा हो गया।कनिष्क कभी बिना वजह नहीं आता।और जब आता है — तो कुछ न कुछ बदल जाता है।उसने आँखें बंद कीं।प्रणाली।



कनिष्क वन में था—
अकेला।
पत्तों के बीच से गुजरता हुआ, शांत और सधे कदमों के साथ।
चेहरे पर वही स्थिर मुस्कान—जो कभी फीकी नहीं पड़ती थी।
तभी—
एक पत्ता हिला।
उसके कदम थम गए।
धीरे से पीछे मुड़ा—
पर वहाँ कोई नहीं था।
सिर्फ पेड़।
सिर्फ हवा।
होंठों पर हल्की मुस्कान फिर से लौटी… और उसने आगे देखा।
और उसी पल—
हवा को चीरती हुई एक परछाईं आई।
इतनी तेज़, इतनी अचानक—कि कनिष्क समझ भी नहीं पाया…
और वह हवा में था।


किसी ने उसकी गर्दन को जकड़ लिया था।
ऊपर—और ऊपर—
बादलों के करीब।
उसने नीचे झांका—
ज़मीन अब बहुत दूर थी।
और उसकी गर्दन पर—
एक लोहे जैसी मज़बूत पकड़ थी।
कनिष्क ने ऊपर देखा—
भूरे, घने, विशाल पंख…
और वो शख्स—
जिसे पहचानने में एक पल भी नहीं लगा।
वर्धान।
अगले ही पल—
वर्धान नीचे झपटा।
तेज़… बेहद तेज़…
और कनिष्क को ज़मीन पर पटक दिया।
धड़ाम।
धरती कांप उठी—
पर उसकी पकड़ नहीं ढीली हुई।
कनिष्क ज़मीन पर था…
और वर्धान उसके ऊपर।
उसकी आँखों में आग जल रही थी।
“दूर रहना उससे।”
इस बार आवाज़ शांत नहीं थी।
हर शब्द में एक चेतावनी थी—
एक वादा।
“दूर रहना उससे।”