वर्धान अपनी नम आंखों और दुनिया जीत लेनी वाली मुस्कान से : मै......और फिर —कुछ याद आया।अचानक।
जैसे किसी ने ठंडा पानी डाल दिया हो।
जो उसको उसके दूत ने बताया था , राजा और प्रणाली के बीच का संवाद :"अब तो अविराज भी युद्ध से आ गया है... तो अब तुम दोनों के विवाह की तैयारी शुरू कर सकते हैं।"
वर्धान की मुस्कान धीरे धीरे —फीकी पड़ गई।हथेलियाँ — जो प्रणाली के चेहरे पर थीं — धीरे से हट गईं।एक कदम पीछे।
बस एक कदम।
पर उस एक कदम में जैसे पूरी दुनिया का फासला था।
"प्रणाली..." — आवाज़ बदल गई थी। अब उसमें वो गर्माहट नहीं थी।"...अविराज आ गया है।"
तीन शब्द।
और प्रणाली जैसे पत्थर हो गई।
वर्धान ने उसकी आँखों में नहीं देखा — नहीं देख सकता था।
"तुम्हारा विवाह तय है। तुम्हारे पिताजी इंतज़ार कर रहे हैं।"आवाज़ — बिल्कुल शांत।
बिल्कुल खाली।जैसे अभी जो हुआ — वो कुछ था ही नहीं।
प्रणाली ने उसे देखा।
वही चेहरा — जो अभी भीगी आँखों से उसे देख रहा था।अब — पत्थर था।
"वर्धान... (प्रणाली से उम्मीद से उसका नाम बताया)
""जाओ।" — वर्धान ने धीरे से कहा। पर मज़बूती से।
प्रणाली के होंठ काँपे।
उसने मन में सोचा ।
शायद....... शायद उसे मेरी परवाह नहीं.....शायद मैंने जो महसूस किया — वो सिर्फ मेरी तरफ से था। शायद उसके लिए मैं बस... कोई और थी....
आँखें भर आईं — पर इस बार रोई नहीं।उसने अपना दामन सँभाला।सिर ऊँचा रखा।और एक कदम — दो कदम — तीन कदम —वो चली गई।
वर्धान वहीं खड़ा रहा।पीठ उसकी तरफ।नदी बह रही थी — वही शांत, बेपरवाह नदी।उसने एक लंबी साँस ली।"
जाना ही था तुम्हें..." — उसने फुसफुसाया — "...यही बेहतर है।"पर आँखें —आँखें झूठ नहीं बोल सकतीं।वो भीगी हुई थीं।
महल में वापस आते वक्त प्रणाली के पाँव भारी थे।
हर कदम जैसे ज़बरदस्ती उठाना पड़ रहा था।
नदी किनारे जो हुआ — वो अभी भी ज़ेहन में था। उसकी भीगी आँखें। उसकी हथेलियाँ जो उसके चेहरे पर थीं। और फिर — वो एक कदम पीछे।
"अविराज आ गया है।"
बस इतना।
प्रणाली ने होंठ भींच लिए।
शायद वो सच में कुछ महसूस नहीं करता। शायद मैं ही पागल हूँ।
वो अपने कक्ष में आई — और बस बैठ गई। चुपचाप।
तभी — बाहर से आवाज़ें आईं।
और कक्ष का दरवाज़ा खुला।
अविराज।
वो मुस्कुरा रहा था — उसी खुली, गर्मजोशी भरी मुस्कान से जो हमेशा उसके चेहरे पर रहती थी। युद्ध की थकान थी — पर आँखों में चमक थी।
"प्रणाली!" — उसने कहा — राहत से, खुशी से।
प्रणाली ने ऊपर देखा। हल्की मुस्कान दी — पर वो मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
अविराज पास आया — उसके सामने बैठा।
"तुम ठीक हो? मुझे पता चला तो मैं सीधा यहाँ आया।"
"हाँ... ठीक हूँ।" — आवाज़ शांत थी। खाली थी।
अविराज ने उसे देखा — एक पल।
फिर धीरे से मुस्कुराया —
"और सुनो... मैं विवाह को और टालने आया हूँ।"
विवाह।
वो शब्द —
जैसे किसी ने घाव पर नमक छिड़क दिया हो।
प्रणाली की आँखों में कुछ काँपा — पर उसने छुपा लिया।
नदी किनारे का वो लम्हा याद आया — वर्धान की हथेलियाँ। उसकी भीगी आँखें। और फिर वो ठंडी आवाज़ —
"जाओ।"
प्रणाली ने एक लंबी साँस ली।
और बोली —
"नहीं।"
अविराज चौंका — "क्या?"
"मुझे यह विवाह... जल्द से जल्द करना है।"
आवाज़ में दर्द था — पर इरादा मज़बूत था।
जो नहीं मिलना — उसका इंतज़ार करने से क्या फायदा।
अविराज कुछ बोलता — तभी कक्ष का दरवाज़ा खुला।
राजा अग्रेद आए — और प्रणाली को देखते ही रुक गए।
"प्रणाली — तुम यहाँ हो। अच्छा हुआ।"
प्रणाली उठकर खड़ी हो गई —
"पिताजी... विवाह की तैयारी शुरू कीजिए।"
राजा एक पल के लिए हैरान रहे।
फिर उनके चेहरे पर खुशी आई — वो खुशी जो वो बहुत दिनों से छुपा रहे थे।
"सच में?"
"जी पिताजी।"
राजा मुस्कुराए — एक गहरी, संतुष्ट मुस्कान। और बिना एक पल गँवाए — वो चले गए। तैयारियों के लिए।
कक्ष में अब सिर्फ दोनों थे।
अविराज उठा। उसने प्रणाली को देखा।
वो प्रणाली नहीं थी — जिसे वो जानता था।
वो प्रणाली — जो हमेशा लड़ती थी, बहस करती थी, हर बात पर तर्क देती थी — आज चुप थी।
आज — टूटी हुई थी।
"प्रणाली।"
वो नहीं बोली।
"प्रणाली।" — इस बार आवाज़ नरम थी।
उसने ऊपर देखा।
अविराज की आँखों में सवाल था — गुस्सा नहीं। बस... चिंता।
"यह तुम नहीं हो।"
प्रणाली ने जवाब नहीं दिया।
"वो लड़की जिसे मैं जानता हूँ — वो विवाह का नाम सुनते ही दस बहाने ढूँढती थी। और आज तुमने खुद..."
वो रुका।
प्रणाली की आँखें भर आई थीं — पर वो रोई नहीं।
"प्रणाली...?" — उसकी आवाज़ में सिर्फ एक सवाल था।
प्रणाली ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं।
और फिर — शांत आवाज़ में बोली —
"मैं वो सब चाहती हूँ अविराज... जो मेरे नसीब मे है "
"बाकी सब..."
होंठ काँपे।
"...बाकी सब भूलना ज़रूरी है
प्रणाली खिड़की के पास खड़ी थी। बाहर की दुनिया चल रही थी… पर उसकी नज़रें कहीं और अटकी थीं—भीतर, बहुत भीतर।
कदमों की आहट आई।
अविराज उसके पास आकर रुका।
कुछ पल बस उसे देखता रहा… जैसे शब्द ढूँढ रहा हो।
"तुम्हें मुझसे शादी करने में दिक्कत है?"
प्रणाली ने धीरे से पलटकर देखा। चेहरा शांत था… पर वो शांति सतही थी।
"तुम्हें तो पहले से पता था… कि मैं तुमसे प्यार नहीं करती। फिर भी?"
अविराज हल्का सा मुस्कुराया—थका हुआ, अधूरा।
"मुझे शादी से कोई दिक्कत नहीं है… बल्कि…" उसने साँस भरी, "यह तो मेरा बचपन का सपना था—तुम्हें अपना बनते हुए देखना।"
उसकी आँखों में कुछ काँपा। एक पल के लिए दीवार दरक गई।
"तुम्हें पता था…?" उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।
"हाँ," उसने बिना झिझक कहा, "मैं जानता था।"
खामोशी।
"पर तब तुम किसी से भी प्यार नहीं करती थीं… लेकिन—"
वो रुक गया।
प्रणाली की उंगलियाँ हल्के से काँप गईं।
"लेकिन…?" आवाज़ टूट गई। नज़रें खुद-ब-खुद झुक गईं।
अविराज ने उसे गौर से देखा—उस चेहरे को, जो खुद को छुपाने की कोशिश कर रहा था। भीगी पलकें… काँपते होंठ… और वो सच्चाई, जो बाहर आने को बेचैन थी।
धीरे से उसने पूछा—
"लेकिन… अब तुम किसी को पसंद करने लगी हो?"
उसकी आवाज़ में एक डर था… और उससे भी ज्यादा—एक उम्मीद, कि जवाब ‘ना’ होगा।
"नहीं!!!"
प्रणाली लगभग घबरा गई। "नहीं… ऐसा कुछ नहीं है…"
पर उसकी आँखें—
वो उसकी नहीं सुन रही थीं।
अविराज ने सब देख लिया। सब समझ लिया।
एक लंबी, भारी साँस उसके सीने से निकली।
"ठीक है…"
बस इतना ही।
वो मुड़ा। कदम बढ़ा दिए।
"उम्मीद करता हूँ… ये सच हो।"
दरवाज़े तक पहुँचा—फिर रुक गया।
पीठ उसकी तरफ थी। आवाज़ अब भी शांत थी… पर उसके नीचे दबा दर्द साफ़ सुनाई दे रहा था।
"प्रणाली…"
एक ठहराव।
"मैंने तुमसे बचपन से प्यार किया है।
बिना किसी वजह के… बिना किसी शर्त के…"
कमरे की हवा जैसे थम गई।
"तुम आखिरी फेरे पर भी मेरा हाथ छोड़ दोगी…"
उसकी आवाज़ भर आई—
"…तो भी मैं वहीं खड़ा रहूँगा… तुम्हारी तरफ।"
और इस बार—वो सच में चला गया।
दरवाज़ा बंद हुआ।
कमरा खाली नहीं था… फिर भी सन्नाटा चीख रहा था।
प्रणाली वहीं खड़ी रही—जैसे समय रुक गया हो।
एक पल…
दो पल…
और फिर—उसके घुटने जवाब दे गए।
वो धीरे से फर्श पर बैठ गई।
आँसू चुपचाप बहने लगे—बिना आवाज़, बिना रोक।
एक तरफ वर्धान था—जिसने उसे चाहा… पर छोड़ दिया।
दूसरी तरफ अविराज था—जो सब जानकर भी उसे छोड़ नहीं पाया।
और वो—
दो प्यारों के बीच नहीं…
दो अधूरे सचों के बीच फँसी थी।
अकेली।
पूरी तरह… अकेली।