सुबह का समय है, सूरज की रोशनी बिल्डिंग पर पड़ रही है,
पर अंदर के माहौल में अब भी एक अजीब ठंडक और खामोशी है।
श्रव्या लिफ्ट के सामने खड़ी है। हाथ में ऑफिस फाइलें हैं, पर चेहरा उतरा हुआ है। वो बार-बार लिफ्ट की तरफ देखती है — जैसे उसका दिल ऊपर जाने से डर रहा हो।
श्रव्या (धीरे, खुद से बड़बड़ाते हुए) बोली -
ऊपर नहीं जाऊँगी... बस अपने केबिन तक...
ऊपर नहीं... वहाँ अब कोई नहीं है... फिर भी डर लगता है...।
लिफ्ट की "टिंग" की आवाज़ आती है। वो चौंक जाती है।
धीरे-धीरे अंदर कदम रखती है, पर 7th फ्लोर का बटन दबाकर तुरंत आँखें बंद कर लेती है।
ऑफिस में बाकी कर्मचारी सामान्य काम कर रहे हैं, पर जब भी कोई 8th या 9th फ्लोर का ज़िक्र करता है,सन्नाटा छा जाता है।
श्रव्या अपने केबिन में बैठी है, पर उसकी आँखें बार-बार ऊपर की सीढ़ियों की ओर जाती हैं।
कर्मचारी 1 (फुसफुसाते हुए) बोला -
अरे वो नई लड़की ना, श्रव्या... वही जो पिछले हफ्ते ऊपर चली गई थी...
कर्मचारी 2 (धीरे से हँसते हुए) बोली -
हाँ हाँ, सुना है... भूतों के बीच घूमकर आई थी।
बाल खुले थे, ऊपर से परफ्यूम लगाया था...फिर भी भूतों ने पकड़ा नहीं उसे!
कर्मचारी 3 (सिहरते हुए) बोला -
शायद... भूतों ने उसे छोड़ दिया... या शायद...वो अब उनके जैसी बन गई हो...।
तीनों के बीच हल्की हँसी, पर माहौल में एक डर का साया है।
श्रव्या ये सब सुनती है, पर कुछ नहीं कहती — बस नीचे देखती है।
कृषांत अपने केबिन में है। वो श्रव्या को दूर से देखता है।
उसकी आँखों में गुस्से से ज़्यादा चिंता है। वो धीरे-धीरे उसके पास आता है।
कृषांत (धीरे, गंभीर स्वर में) बोला -
श्रव्या, तुम अब भी डरी हुई लगती हो।
मैंने कहा था ना, ऊपर का सब भूल जाओ।
वो सब बीत चुका है।
श्रव्या (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली -
पर सर... मैं भूलना चाहती हूँ, पर...कभी-कभी लगता है जैसे कोई देख रहा हो मुझे...मेरे पीछे... दीवारों के उस पार से...।
कृषांत चुप हो जाता है। हल्की हवा चलती है। कमरे की खिड़की अपने आप खुल जाती है। दोनों एक पल के लिए डरकर उधर देखते हैं — बाहर कोई नहीं। सिर्फ हवा... और खालीपन।
रात का समय। ऑफिस में सब जा चुके हैं। श्रव्या अपना लैपटॉप बंद करती है, पर बाहर से किसी के चलने की हल्की “टक...टक...” आवाज़ आती है।
श्रव्या (धीरे से, डरते हुए) बोली -
कोई है वहाँ?
कोई जवाब नहीं। वो धीरे-धीरे दरवाज़े की तरफ बढ़ती है।
जैसे ही बाहर झाँकती है, हवा का झोंका आता है और उसके बाल उड़ जाते हैं। हवा में हल्की परफ्यूम की खुशबू फैलती है — वही जो उसने उस दिन लगाई थी।
दूर 9th फ्लोर की खिड़की में कोई परछाई झलकती है।
एक लड़की... हरे टॉप में...मुस्कुराती हुई।
कभी-कभी डर हमारे साथ नहीं चलता...
हम खुद उसके साथ चलने लगते हैं...
ऑफिस का ब्रेक रूम। रात के 9 बज चुके हैं। बारिश हो रही है, बाहर बिजली की चमक माहौल को और डरावना बना रही है।
टेबल पर कोल्ड ड्रिंक, स्नैक्स और मोबाइल कैमरे रखे हैं।
चार-पाँच कर्मचारी गोल में बैठे हैं श्रव्या, कामिनी, विवेक, अनुज और साक्षी।
अनुज (हँसते हुए) बोला -
कृषांत सर बाहर गए हैं, तो थोड़ा मस्ती तो बनती है ना!
कामिनी (मुस्कुराते हुए, चालाकी से) बोली -
हाँ, बिल्कुल! आज करेंगे असली Truth or Dare!
सब हँसते हैं। बॉटल घुमाई जाती है। पहला टर्न श्रव्या पर आता है।
विवेक (मजाक में) बोला -
ओह ओह... श्रव्या सिंह! Truth or Dare?
श्रव्या (थोड़ा मुस्कुराकर) बोली -
Dare!
बाकी सब "ओह!" कहते हैं और तालियाँ बजाते हैं। अब कामिनी की बारी आती है Dare देने की। उसके चेहरे पर खतरनाक मुस्कान उभरती है।
कामिनी (धीरे से, तंज भरे लहज़े में) बोली -
ठीक है... मेरा डेयर ये है —
तुम्हें 8th और 9th फ्लोर पर जाकर वीडियो बनाना होगा...
और वहाँ पूरे एक घंटे रहना होगा!
बाकी सब चौंक जाते हैं। माहौल अचानक गंभीर हो जाता है।
साक्षी (फौरन) बोली -
क्या पागल हो गई हो, कामिनी? वहाँ कोई नहीं जाता!
अनुज (धीरे से) बोला -
वो तो... भूतों वाला फ्लोर है...
कामिनी हँसने लगती है।
कामिनी (मज़ाक उड़ाते हुए) बोली -
अरे, डर क्यों रहे हो सब?
श्रव्या तो बहुत बहादुर है ना!
कृषांत सर के मना करने के बाद भी ऊपर जा चुकी है।
अब डर लग रहा है?
सबकी नज़र श्रव्या पर जाती है।
वो एक पल के लिए चुप रहती है... फिर धीरे से मुस्कुराती है।
श्रव्या (आत्मविश्वास से) बोली -
ठीक है... मैं जाऊँगी।
वीडियो भी बनाऊँगी, और एक घंटा रहकर दिखाऊँगी!
सब हैरान। कामिनी के चेहरे पर आधी जलन, आधी खुशी है।
रात के 10 बजे। ऑफिस की लाइट्स धीमी हैं।
श्रव्या मोबाइल कैमरा ऑन करती है, और लिफ्ट में कदम रखती है।
मोबाइल रिकॉर्डिंग (श्रव्या की आवाज़) बोली -
तो दोस्तों, ये है मेरा डेयर...अभी मैं जा रही हूँ 8th फ्लोर पर...
देखते हैं वहाँ क्या है...
लिफ्ट की लाइट टिमटिमाती है। वो दरवाज़ा खुलते ही बाहर निकलती है। 8th फ्लोर अंधेरा है, सिर्फ कोनों में हल्की लाइट झिलमिला रही है।
कैमरा दिखाता है — पुराने डेस्क, टूटी कुर्सियाँ, दीवारों पर उखड़ी पेंट... और वही जगह जहाँ रिया का नाम लिखा था।
श्रव्या (धीरे से बोलती है) बोली -
प्रिशा शर्मा... अगर तुम यहाँ हो...तो मुझसे मिलने आओ...।
कैमरा हिलता है, हल्की हवा चलती है। एक फाइल ज़मीन पर गिरती है। श्रव्या चौंकती है — पर फिर मुस्कुराती है।
श्रव्या बोली -
ठीक है, शायद हवा थी...
वो आगे बढ़ती है — सीढ़ियों की तरफ। अब 9th फ्लोर पर चढ़ती है। सीढ़ियों की हर आहट गूँजती है।
9th फ्लोर का दरवाज़ा धीरे से खुलता है।
वही पुराना सन्नाटा, वही टूटी खिड़कियाँ, और वही बालकनी जहाँ प्रिशा मरी थी। श्रव्या वीडियो बना रही है, कैमरे की फ्लैश जल रही है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
तो दोस्तों... अब मैं 9th फ्लोर पर हूँ...
अचानक... पीछे से किसी लड़की की धीमी हँसी सुनाई देती है — बहुत हल्की, मगर साफ़।
आवाज़ (धीरे से) बोली -
तुम फिर आ गई...
श्रव्या पीछे मुड़ती है — कोई नहीं। लेकिन कैमरे की स्क्रीन पर हरे रंग का साया दिखता है। वो डर जाती है, पर फिर हिम्मत जुटाती है।
श्रव्या बोली -
कौन है वहाँ?
अचानक खिड़की अपने आप खुलती है , बाल उड़ते हैं, लाइट टिमटिमाती है। कहीं से वही हरा दुपट्टा उड़कर आता है और उसके कंधे पर गिरता है। वो डर के मारे पीछे हटती है — कैमरा उसके हाथ से गिर जाता है। नीचे ब्रेक रूम में — सब टाइम देख रहे हैं।
साक्षी (चिंतित होकर) बोली -
एक घंटा हो गया... श्रव्या वापस क्यों नहीं आई?
विवेक बोला -
शायद नेटवर्क नहीं मिल रहा होगा...।
कामिनी धीरे से मुस्कुराती है।
कामिनी (धीरे, खुद से) बोली -
शायद अब उसे समझ आ गया होगा...मज़ाक किसे कहते हैं...।
कभी-कभी डेयर सिर्फ़ गेम नहीं होता...
वो किसी की आत्मा को जगाने का निमंत्रण होता है...