Honted Jobplace - 5 in Hindi Crime Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Honted Jobplace - 5

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Honted Jobplace - 5

9th और 8th floor पर कमरे में हल्की धूल, टूटी हुई खिड़कियाँ, और धूप की किरणें अजीब तरह की छाया डाल रही हैं।
श्रव्या खड़ी है — उसके हाथ में प्रिशा, संतोष और स्मिता की फाइलें। उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि दृढ़ता और हल्की मुस्कान है।

प्रिशा (धीरे, खुद से) बोली - 
अब तुम्हें शांति मिलेगी। तुम फँसे नहीं रहोगे।
मैं... मैं तुम्हें आज़ाद करती हूँ।

वो फाइल जमीन पर रखती है। जैसे ही वो ऐसा करती है, कमरे में हवा तेज़ हो जाती है। पुराने पंखे घूमने लगते हैं। दीवारों पर हल्की रोशनी की परछाइयाँ उभरती हैं। प्रिशा, संतोष और स्मिता की परछाइयाँ धीरे-धीरे दिखाई देने लगती हैं।
कृषांत अचानक फ्लोर में आता है , उसके चेहरे पर डर और चिंता है। वो कमरे के चारों तरफ देखता है।bभूतों की मौजूदगी से लाइट्स टिमटिमा रही हैं।

प्रिशा का भूत (धीरे, धुंधली आवाज़ में) बोला - 
श्रव्या... तुमने हमें याद किया...

संतोष का भूत बोला - 
हम अब... फँसे नहीं रहेंगे...

स्मिता का भूत बोला - 
धन्यवाद, तुमने हमें आज़ाद किया...

भूत अचानक तेज़ हवा में घूमते हैं। ऑफिस के सारे कागज़ उड़ने लगते हैं। लिफ्ट अपने आप ऊपर-नीचे होने लगती है। कंप्यूटर स्क्रीन जल उठती हैं और फिर बुझ जाती हैं।

हवा में भूतों की धीमी हँसी गूँजती है — 
अब हम आज़ाद हैं!

श्रव्या (धीरे से, स्थिर स्वर में) बोली - 
अब कोई डर नहीं। अब कोई पीड़ा नहीं।
ये ऑफिस अब हमारी वजह से नहीं, उनकी वजह से जीवित है।

भूत ऑफिस में घूमते हैं। पुरानी फाइलें उड़ती हैं। टेबलें हिलती हैं।
दीवारों पर खून के पुराने दाग अब हल्की रोशनी में चमकते हैं।
कृषांत पीछे खड़ा है ,  डर के बावजूद उसे गर्व और हल्की राहत महसूस हो रही है।

कृषांत (धीरे, गंभीर स्वर में) बोला - 
श्रव्या... तुमने जो किया, वो बहादुरी से कम नहीं।
लेकिन अब ये ऑफिस हमेशा के लिए... अलग हो गया है।

श्रव्या उसके पास जाती है।  भूत धीरे-धीरे हवा में घुल जाते हैं — ऑफिस अब खाली है। पर हल्की ठंडी हवा अभी भी चल रही है।
श्रव्या खिड़की के पास खड़ी है, सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही हैं।

श्रव्या (धीरे से, मुस्कुराते हुए) बोली - 
अब इस जगह को डर और मौत नहीं, सिर्फ यादें और शांति चाहिए।

जो बंधे रह गए, उन्हें बस मासूमियत ने ही आज़ाद कर दिया...
कुछ देर बाद कृषांत बाहर गया।

श्रव्या खड़ी है — उसके हाथ में रिया की फाइल है। बाहर हल्की धूप, हवा में धूल उड़ रही है। धीरे-धीरे ऑफिस में हल्की सरसराहट और टेबल हिलने की आवाज़ आती है।

समृद्धि (धीरे से, खुद से) बोली - 
ये... ये कैसे हुआ? मैंने तो बस यहाँ आई थी...
फाइल देखी, और... वो लोग — प्रिशा, संतोष और स्मिता — अचानक दिखने लगे...

जैसे ही वह फाइल रखती है, कमरे में हवा तेज़ हो जाती है।
पुरानी पंखों की आवाज़, हल्की सरसराहट। भूतों की परछाइयाँ धीरे-धीरे उभरती हैं — प्रिशा, संतोष और स्मिता।
ऑफिस में हलचल, टेबल हिलना, कागज़ उड़ना — पूरी जगह हॉरर मोड में बदल गई है।

कृषांत अचानक कमरे में प्रवेश करता है। उसका चेहरा लाल है, आँखों में गुस्सा और डर दोनों हैं। वो श्रव्या की ओर तेजी से बढ़ता है।

कृषांत (गुस्से में, चीखते हुए) बोला - 
श्रव्या! तुम पागल हो क्या? मैंने साफ मना किया था तुम्हें यहाँ आने से! और तुम... सीधे 8th और 9th फ्लोर पर चली गईं?
तुम्हें पता भी नहीं था कि ये कितने खतरनाक हो सकता है!

श्रव्या काँपती है, लेकिन झुकती नहीं। वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाती है।

श्रव्या (धीरे, पर ज़िद भरे लहज़े में) बोली - 
सर, मुझे सच जानना था। मुझे समझना था कि ये जगह क्यों बंद है... और ये भूत कौन हैं।
मैं... मैं उनकी मदद करना चाहती थी।

कृषांत गहरी साँस लेता है। उसके हाथ फाइल पकड़ते हुए टेबल पर जोर से पड़ते हैं।

कृषांत (गुस्से और बेचैनी में, तेज़ आवाज़ में) बोला - 
मदद? ये मदद नहीं, श्रव्या!
तुमने बस उन्हें आज़ाद कर दिया — और अब ये ऑफिस पूरी तरह भूतिया हो चुका है! अगर आज मैं समय पर नहीं आता, तो तुम जानती क्या होता!

श्रव्या बोली - 
सर! आपको हो क्या गया है, अभी कुछ देर पहले जब आप आए थे तब तो बहादुर बोल रहे थे। अब क्या हो गया?

कृषांत बोला - 
What! मैं कब आया , मैं तो अभी आया हूं श्रव्या। 
तुम पागल तो नहीं हो ?!

श्रव्या बोली - 
सर में सच बोल रही हूं।

कृषांत बोला -
तुम पागल हो चुकी हो श्रव्या!

श्रव्या बोली - 
सर! अभी तो आप आए थे। मैने खुद आपको छुआ भी था सर। सच में मैं मैं झूठ नहीं बोलती सर।

कृषांत बोला - 
ऐसा कैसे हो सकता है श्रव्या! मैं तो अभी आया हूं ।
तुम्हे कोई गलत फहमी हुई है ।

श्रव्या बोली - 
मुझे गलत फहमी कैसे।

फिर कुछ देर सोचने के बाद बोली - 
हे भगवान! कहीं.....

श्रव्या पीछे झुकती है। उसका चेहरा डर और पछतावे से भर जाता है। कृषांत उसका हाथ पकड़ता है और उसे अपनी ओर खींचता है।
श्रव्या बार-बार पीछे मुड़कर देखती है, कमरे में हल्की परछाइयाँ उभर रही हैं, कागज़ उड़ रहे हैं, फाइलें गिर रही हैं, ऑफिस अब हॉरर मोड में है। श्रव्या धीरे-धीरे सांस लेती है। उसकी आँखों में अब डर के साथ जिज्ञासा भी है।

श्रव्या (धीरे, फुसफुसाते हुए) बोली - 
सर... मैं नहीं जानती थी कि ये सब होगा।
मैंने बस उनकी मदद करना चाहा था... उन्हें शांति चाहिए थी...

कृषांत गहरी साँस लेता है। उसकी आँखों में अब सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि चिंता और हल्की राहत भी है। वो श्रव्या की ओर धीरे-धीरे झुकता है।

कृषांत (धीरे, गंभीर स्वर में) बोला - 
श्रव्या... ये ऑफिस अब हमेशा के लिए अलग हो गया है।
और तुमने जो किया, उसका असर हमेशा रहेगा।
लेकिन अब तुम्हें समझना होगा कि… भूतों के साथ खिलवाड़ कितना खतरनाक हो सकता है।
भूत धीरे-धीरे हवा में घुल जाते हैं। पर हल्की ठंडी हवा अब भी चल रही है।
श्रव्या खिड़की के पास खड़ी है, सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही हैं। ऑफिस अब खाली है, पर माहौल अब भी भारी और रहस्यमयी है।

जो मासूमियत भरी जिज्ञासा होती है, वही कभी-कभी सबसे खतरनाक ताकत बन जाती है...

आपको क्या लगता है -
क्या कृषांत झूठ बोल रहा था?
या सच में कृषांत की जगह कोई और था ? 
क्या वो आत्माएं आतंक मचाएंगी?

Agar aapko kahani pasand aa rahi ho to follow jaroor karen। Or rating or comments bhi jaroor den।  Taki mujhe motivation milta Rahe।