कुछ देर बार फिर शांति छा गई। श्रव्या को देखकर लग रहा था कि अब उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं। वो अब उस floor को देखकर ही जाएगी।
श्रव्या बोली -
अब चाहे कुछ भी हो....मैं इस floor को देखकर ही जाऊंगी।
धूप की हल्की किरणें शीशे से छनकर कमरे में पड़ रही हैं। हवा में सन्नाटा है , पर एक अजीब-सी मासूमियत भी। श्रव्या खिड़की के पास खड़ी है, आँखें बंद, हवा को महसूस करती हुई। उसके बाल चेहरे पर उड़ते हैं।
बैकग्राउंड आवाज़ (श्रव्या के मन की) —
ये खामोशी... कितनी सुकूनभरी है... जैसे कोई अपनी कहानी सुना रही हो...
अचानक... पीछे से किसी के चलने की हल्की आवाज़ आती है — “टक...टक...टक...”
श्रव्या की पलकों में हरकत होती है। वो धीरे-धीरे आँखें खोलती है। सामने एक लड़की खड़ी है। उसकी पीठ श्रव्या की तरफ है। लंबे, घने बाल। हरे रंग का टॉप, और काले रंग की प्लाज़ो। वो लड़की बहुत धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है। कदमों की आवाज़ गूँज रही है, पर कमरे में अब भी वही शांति है।
श्रव्या (धीरे से, मुस्कुराते हुए) बोली -
शायद कोई एम्प्लॉयी ऊपर आ गई है...
वो लड़की को देखती रहती है। उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि जिज्ञासा और मासूम मुस्कान है।
श्रव्या (थोड़ा ज़ोर से) बोली -
हैलो... सुनिए... आप यहाँ काम करती हैं?
लड़की नहीं रुकती। बस धीरे-धीरे आगे बढ़ती जाती है। श्रव्या को जैसे किसी अजीब शक्ति ने बाँध लिया हो , वो भी उसके पीछे चलने लगती है, बिना सोचे। दोनों के बाल एक जैसे उड़ रहे हैं।लड़की चलते-चलते बालकनी के एकदम किनारे पर जाकर रुकती है। बाहर धूप चकाचौंध कर रही है। श्रव्या भी उसके पीछे जाती है, और एक कदम आगे बढ़ाने ही वाली होती है...।
अचानक — किसी का हाथ उसके हाथ पर कसकर पकड़ता है और उसे ज़ोर से पीछे खींच लेता है। वो किसी के सीने से टकराती है , वो कृषांत है!
कृषांत (तेज़ साँस लेते हुए, गुस्से और डर से) बोला -
श्रव्या! तुम यहाँ क्या कर रही हो? तुम्हें मरने का शौक है क्या!
कितनी देर से आवाज दे रहा हूं तुम्हें मैं।
श्रव्या हाँफते हुए कृषांत की तरफ देखती है, उसकी आँखों में अब भी सवाल है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
वो... वो लड़की... यहीं थी कृषांत sir... यहीं बालकनी पर...
कृषांत (कड़कते हुए) बोला -
यहाँ कोई नहीं है! समझी तुम? ये फ्लोर बंद है... यहाँ कोई नहीं आता!
वो श्रव्या का हाथ पकड़कर पीछे खींचता है। श्रव्या पीछे देखती है बालकनी खाली है। हवा चल रही है। बस एक हरा दुपट्टा रेलिंग पर अटका हुआ है... धीरे-धीरे हवा में लहराता हुआ। श्रव्या हैरानी से उसे देखती है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
ये... ये दुपट्टा... वही तो था जो उस लड़की ने पहना था...
कृषांत एक पल को रुकता है , उसके चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी आती है।
कृषांत (धीरे से, झिझकते हुए) बोला -
श्रव्या... नीचे चलो। ये जगह तुम्हारे लिए नहीं है।
वो उसका हाथ पकड़कर लिफ्ट की तरफ ले जाता है। श्रव्या अब भी पीछे मुड़कर देखती है बालकनी पर वही लड़की खड़ी है। वही हरा टॉप, वही काले प्लाज़ो , बस अब उसका चेहरा दिखता है... और आँखें एकदम ख़ाली। लड़की की आँखों में दर्द, और होंठों पर हल्की सी मुस्कान...
जैसे कह रही हो —
तुम मुझसे मिल चुकी हो।
लिफ्ट का दरवाज़ा बंद होता है। लिफ्ट में सन्नाटा है। कृषांत नीचे देख रहा है, जैसे कुछ सोच रहा हो। श्रव्या उसके चेहरे को देखती है — उसे लगता है कि कृषांत कुछ छुपा रहा है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
Sir... क्या आप प्रिशा शर्मा को जानते थे?
कृषांत एकदम ठिठकता है, उसकी आँखें फैल जाती हैं।
कृषांत (रुक-रुक कर) बोला -
कौन... प्रिशा शर्मा?
श्रव्या की नज़र उस पर टिकी रहती है। उसकी आवाज़ अब ठंडी है।
श्रव्या बोली -
वही... जिसकी तस्वीर 8th फ्लोर की फाइल में थी। जिसके साथ ‘Together Forever’ लिखा था।
कृषांत कुछ नहीं बोलता। बस आँखें झुका लेता है। लिफ्ट की लाइट टिमटिमाती है।
बैकग्राउंड में वही लड़की की हँसी की हल्की आवाज़ गूँजती है — हूँ... तो तुम अब भी झूठ बोल रहे हो...
कृषांत एकदम चौकता है — और श्रव्या उसे देखती रहती है। लिफ्ट नीचे पहुँच जाती है। दरवाज़ा खुलता है। कृषांत जल्दी से बाहर चला जाता है। श्रव्या वहीं खड़ी रह जाती है... उसकी आँखों में अब जिज्ञासा नहीं — शक है।
कभी-कभी जो सच दिखता है, वो बस कहानी की शुरुआत होती है...
लिफ्ट के दरवाज़े बंद होते हैं। श्रव्या हल्के काँपते हाथों से रेलिंग पकड़ रही है। कृषांत का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ है। एक डर में, दूसरा चिंता में।
कृषांत का केबिन – शाम का वक्त
दरवाज़ा ज़ोर से खुलता है। कृषांत तेज़ी से अंदर आता है, श्रव्या को खींचकर कुर्सी पर बैठा देता है।
कृषांत (ग़ुस्से में) बोला -
पागल हो क्या तुम, श्रव्या!? मैंने साफ़ मना किया था न कि ऊपर नहीं जाना!
वो डेस्क पर ज़ोर से फाइल पटकता है, आवाज़ कमरे में गूंजती है।
कृषांत (तेज़ साँस लेते हुए) बोला -
एक तो मेरे मना करने के बाद ऊपर चली गई... और ऊपर से बाल खोलकर, परफ़्यूम लगाकर ऐसे घूम रही थी जैसे पिकनिक मनाने आई हो! पता भी है, वो जगह कितनी खतरनाक है?
श्रव्या डर के मारे सिर झुका लेती है। उसकी आँखों में आँसू हैं, पर होठ काँपते हुए भी कुछ कहने की कोशिश करते हैं।
श्रव्या (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली -
मैं... मैं बस देखना चाहती थी... वहाँ एक लड़की थी, sir... वो सामने खड़ी थी...
कृषांत अचानक रुकता है। उसकी आँखों में एक झटका आता है। पर अगले ही पल वो गुस्से से बोलता है।
कृषांत (कड़क आवाज़ में) बोला -
बस करो ये बकवास! वहाँ कोई नहीं था!
वो टेबल पर हाथ मारता है। आवाज़ कमरे में गूंजती है। श्रव्या सहमकर पीछे हटती है।
कृषांत (थोड़ा धीमे, पर सख्त स्वर में) बोला -
अगर आज मैं वहाँ नहीं होता, तो तुम... तुम बालकनी से गिर चुकी होती! समझती भी हो क्या कर रही थी तुम?
श्रव्या धीरे से उठती है, उसकी आँखें आँसुओं से भीग चुकी हैं।
श्रव्या (टूटी आवाज़ में) बोली -
मुझे लगा वो... मुझे बुला रही थी...
कृषांत कुछ पल चुप रहता है। उसकी आँखों में अजीब-सा दर्द झलकता है। फिर वो नज़रें फेर लेता है।
कृषांत (धीरे से, पर ठंडे स्वर में) बोला -
बस, अब इस बात का ज़िक्र दोबारा मत करना। जो देखा, भूल जाओ।
वो मुड़कर खिड़की के पास चला जाता है। उसके चेहरे पर सख़्ती है, पर आँखों में कहीं गहरी चिंता। श्रव्या उसे देखती रहती है, उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक गहरी उलझन है , जैसे वो महसूस कर रही हो कि कृषांत कुछ छिपा रहा है।
बैकग्राउंड में हल्की फुसफुसाहट की आवाज़ आती है —
जैसे कोई कह रहा हो—
वो वापस आ गई है...
श्रव्या चौक जाती है। उसकी आँखें खिड़की की ओर उठत हैं... जहाँ हवा से वो हरा दुपट्टा फिर धीरे-धीरे लहरा रहा है। श्रव्या अब भी कृषांत के केबिन में बैठी है। बाहर शाम का समय है, सूरज की किरणें शीशे से लाल रंग की छाया डाल रही हैं। माहौल भारी और चुप्पी से भरा हुआ है। श्रव्या की आँखों में बेचैनी है। वो धीरे से उठती है और कृषांत के सामने खड़ी हो जाती है।
श्रव्या (धीरे, लेकिन ज़िद भरे लहज़े में) बोली -
आप हमेशा मना करते हैं मुझे 8th और 9th फ्लोर पर जाने से...
क्यों, sir? आखिर ऐसा क्या है वहाँ?
कृषांत सिर झुकाए फाइलों में कुछ देखने का दिखावा करता है, पर जवाब नहीं देता। श्रव्या और पास आती है।
श्रव्या (थोड़ी ऊँची आवाज़ में) बोली -
मैं सच जानना चाहती हूँ! मुझे क्यों नहीं जाने देते वहाँ?
क्यों हर बार डराते हैं? क्या छिपा रहे हैं आप मुझसे?
कृषांत अचानक रुकता है। उसकी उँगलियाँ फाइल पर जकड़ जाती हैं। धीरे-धीरे वो कुर्सी से उठता है, और श्रव्या के बहुत पास आकर खड़ा हो जाता है।
कृषांत (धीरे, ठंडी आवाज़ में) बोला -
क्योंकि... वहाँ भूत हैं, श्रव्या।
श्रव्या की आँखें बड़ी जाती है।
श्रव्या (हकबकाई हुई आवाज़ में) बोली -
भ...भूत?
कृषांत (गंभीर स्वर में, नज़रें सीधे उसकी आँखों में डालकर)
बोला -
हाँ। एक नहीं... तीन।
प्रिशा, संतोष और माया के भूत।
उसकी आँखों में डर नहीं, बल्कि दर्द है जैसे वो उन्हें जानता हो।
श्रव्या (काँपते हुए) बोल -
क...कौन थे ये लोग?
कृषांत कुछ पल चुप रहता है। फिर गहरी साँस लेकर खिड़की की ओर देखता है।
कृषांत (धीरे से, भारी आवाज़ में) बोला -
तीन साल पहले... इसी ऑफिस में काम करते थे।
प्रिशा पहले मेरी assistant थी फिर प्रिशा— टीम लीड थी।
संतोष — अकाउंट हेड।
और स्मिता... रिसेप्शनिस्ट थी।
आपको क्या लगता है -
इन तीनों की मौत कैसे हुई होगी ?
क्या इन तीनों की कहानियां जुड़ी हैं ?
क्या इन तीनों की मौत का कोई संबंध है ?
Agar aapko kahani pasand aa rahi ho to follow jaroor karen। Or rating or comments bhi jaroor den। Taki mujhe motivation milta Rahe।