श्रव्या अपनी टेबल पर बैठी है लेकिन उसका मन काम में नहीं है। दिमाग में वही बात घूम रही है।
श्रव्या (सोचते हुए, बैकग्राउंड आवाज़ में) बोली -
जब मैंने पहले दिन बिल्डिंग के बाहर से देखा था... तो 9th फ्लोर पर एक लड़की किसी लड़के के साथ खड़ी थी... तो क्या वो प्रिशा थी? और वो लड़का... संतोष?
वो खिड़की से ऊपर देखती है, 9th फ्लोर के शीशों पर हल्की सी धूप पड़ रही है। अंदर अंधेरा।
श्रव्या (धीरे से खुद से) बोली -
मुझे खुद देखना होगा... आखिर इस मंज़िल में ऐसा क्या राज़ है...।
घड़ी देखती है — दोपहर का 1:30 बजा है। लंच टाइम। ज्यादातर एम्प्लॉई कैंटीन में हैं। कृषांत अपने केबिन में किसी क्लाइंट कॉल में बिज़ी है। श्रव्या धीरे-धीरे उठती है, आस-पास देखती है और लिफ्ट की तरफ बढ़ती है। लिफ्ट में प्रवेश करते हुए उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा है। कैमरा उसके कांपते हाथ पर फोकस करता है जो लिफ्ट के बटन पर जा रहा है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
चलो... सिर्फ एक झलक...
वो ‘8th Floor’ का बटन दबाती है — बटन हल्की रोशनी से चमकता है। लिफ्ट धीरे-धीरे ऊपर बढ़ती है।
‘7’... ‘8’... लिफ्ट रुकती है। दरवाज़े खुलते हैं।
श्रव्या बाहर निकलती है — चारों तरफ अजीब सी खामोशी। यहाँ ऑफिस नहीं, बल्कि पुराने टूटे हुए केबिन, धूल जमी हुई टेबलें, और दीवारों पर उखड़ा हुआ पेंट है।
श्रव्या (धीरे-धीरे चलते हुए) बोली -
इतनी पुरानी हालत में ये फ्लोर क्यों है? किसी ने बताया तक नहीं...
वो आगे बढ़ती है, ज़मीन पर एक पुरानी फाइल पड़ी है जिस पर लिखा है — “prisha Sharma – Confidential.”)
वो झुककर उठाती है, फाइल से एक पुरानी फोटो गिरती है — जिसमें प्रिशा और एक लड़का साथ में हैं। फोटो के पीछे लिखा है — “Together Forever.”)
श्रव्या (हैरान होकर) बोली -
तो ये वही होंगे... प्रिशा और संतोष...
उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक अजीब-सी शांति और जिज्ञासा झलक रही है।
बैकग्राउंड आवाज़ (श्रव्या के मन की) —
अजीब है... लोग इस जगह से डरते हैं, पर मुझे तो यहाँ एक अजीब-सी शांति महसूस हो रही है... जैसे ये जगह मुझसे कुछ कहना चाहती हो...
8th फ्लोर पर हल्की धूप पड़ रही है। दीवारों पर टूटी पेंट की दरारों से रौशनी अंदर आ रही है। हवा में पुराने परफ्यूम की हल्की खुशबू है। श्रव्या धीरे-धीरे एक कैबिन के पास जाती है। वहाँ टेबल पर अब भी एक नाम प्लेट रखी है — “P. Sharma”.)
वो मुस्कुराकर धीरे से उस पर हाथ फेरती है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
प्रिशा शर्मा... तुम्हारे बारे में सब कहते हैं कि तुम डरावनी हो... लेकिन मुझे नहीं लगता। तुम्हारे अंदर कुछ तो बहुत सच्चा था...
वो आँखें बंद करती है, गहरी साँस लेती है। हल्की हवा की सरसराहट, खिड़की के शीशे पर सूरज की किरणें। श्रव्या धीरे-धीरे पीछे के हिस्से की ओर बढ़ती है जहाँ सीढ़ियाँ ऊपर की तरफ जाती हैं।
श्रव्या (धीरे से खुद से) बोली -
ये सीढ़ियाँ... शायद 9th फ्लोर तक जाती हैं।
वो एक पल के लिए रुकती है, फिर धीरे से कदम बढ़ाती है। हर कदम की आवाज़ सुनाई देती है — ठक... ठक... ठक... जैसे-जैसे वो ऊपर बढ़ती है, रोशनी कम होने लगती है, पर माहौल फिर भी डरावना नहीं, बल्कि अजीब-सा सुकूनभरा है।
9th फ्लोर का दरवाज़ा सामने आता है — लकड़ी का पुराना दरवाज़ा, जिस पर हल्की धूल जमी है और जंग लगे ताले की जंजीर ढीली लटक रही है। श्रव्या ताले को छूती है — और आश्चर्य से देखती है कि वो पहले से खुला है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
अरे... ये तो बंद होना चाहिए था...
वो दरवाज़ा धीरे से धकेलती है — कर्कश आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुलता है। अंदर हल्की धूप की किरणें शीशे से छनकर आ रही हैं। पूरा फ्लोर खाली है। टूटे हुए केबिन, एक पुराना सोफा, दीवारों पर पुराने पोस्टर — “Team prisha – Best Performer of the Month.”)
श्रव्या धीरे-धीरे घूम रही है, चेहरे पर हल्की मुस्कान। वो एक जगह कुछ दाग देखती है। जमीन पर। लाल लाल से। फिर white paint दीवार पर भी ऐसे ही छींटे थे लाल लाल से। उसने सोचा शायद जंग के होंगे। क्योंकि उस रूम में दीवार पर बहुत सारे छींटे थे और जमीन पर भी बहुत बड़ा दाग था।
श्रव्या (धीरे से खुद से) बोली -
ये जगह डरावनी नहीं... खूबसूरत है। बस खामोश... लेकिन इस खामोशी में भी कोई अपनापन है...
वो खिड़की के पास जाती है। बाहर धूप चमक रही है। वो नीचे झांकती है — बिल्डिंग की छतें और छोटे लोग दिख रहे हैं। हल्की हवा चलती है, उसके बाल उड़ते हैं। एक पल के लिए लगता है जैसे कोई उसके बालों को सहला रहा हो। वो मुस्कुराती है — आँखें बंद करती है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
प्रिशा... क्या तुम यहीं रहती हो? क्या तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो?
अचानक उसके पीछे किसी के चलने की धीमी आवाज़ आती है।
वो पलटकर देखती है पर वहाँ कोई नहीं। फिर एक हल्की सी परछाई दीवार पर पड़ती है किसी लड़की की। उसके हाथों में एक फाइल है।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
प्रिशा...
परछाई धीरे-धीरे घूमती है... और गायब हो जाती है। हवा एकदम थम जाती है। श्रव्या वहीं खड़ी रह जाती है, उसके चेहरे पर न डर है, न आश्चर्य बस एक गहरा सुकून।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
अब मैं समझी... ये मंज़िल डरावनी नहीं... दर्दभरी है।
तभी नीचे से किसी की ज़ोरदार आवाज़ आती है — कृषांत की।
कृषांत (चिल्लाते हुए) बोला -
श्रव्या! नीचे आओ! तुरंत नीचे आओ!
उसकी आवाज़ में गुस्सा और घबराहट दोनों हैं। श्रव्या पीछे मुड़कर देखती है, लेकिन अब दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका है। वो दौड़ती है, दरवाज़ा खोलने की कोशिश करती है लेकिन दरवाज़ा नहीं खुलता। लाइट टिमटिमाने लगती है। हवा तेज़ हो जाती है।
दीवार पर प्रिशा की तस्वीर खुद-ब-खुद गिर जाती है। पीछे लिखा दिखाई देता है — “Don’t trust anyone.”) श्रव्या की आँखें फैल जाती हैं।
श्रव्या (धीरे से) बोली -
प्रिशा... क्या कहना चाहती हो तुम?
अचानक 9th फ्लोर की लाइट पूरी तरह बंद हो जाती है।
और अंधेरे में एक जानी-पहचानी आवाज़ गूँजती है —
भागो... देर हो जाएगी।
श्रव्या चीखती है —
कौन!
बिल्डिंग के ऊपर सिर्फ एक खिड़की में हल्की नीली रोशनी जलती दिखाई देती है — वही 9th फ्लोर की खिड़की...।
कभी-कभी शांति भी चीखों से ज़्यादा डरावनी होती है... 👻
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क्या श्रव्या वहां से निकल पाएगी?
अगर निकल भी गई तो कृषांत क्या बोलेगा?
क्या करने वाली थी प्रिशा?
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