Honted Jobplace - 4 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Honted Jobplace - 4

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Honted Jobplace - 4

कृषांत की आँखों में अंधकार झलकता है। आवाज़ धीमी और भारी है।

कृषांत (धीरे-धीरे बोलते हुए) बोला - 
उस रात... रात के ठीक 12 बजे... प्रिशा और संतोष 9th फ्लोर पर थे। वो दोनों उस प्रोजेक्ट की फाइल पर काम कर रहे थे...
किसे पता था, कि वो उनकी आख़िरी रात होगी...

🎞️ फ्लैशबैक — 3 साल पहले

ऑफिस की लाइटें मंद हैं। घड़ी की सूई 12 पर रुकती है।
प्रिशा और संतोष कंप्यूटर पर कुछ देख रहे हैं। बाहर हल्की हवा चल रही है।

प्रिशा (थोड़ी थकी हुई आवाज़ में) बोली - 
बस ये रिपोर्ट भेज दो संतोष, फिर चलते हैं... आज बहुत लेट हो गया...।

संतोष (हँसते हुए) बोला - 
तुम कहो तो यहीं सो जाता हूँ ऑफिस में...

प्रिशा मुस्कुरा देती है, तभी पीछे से दरवाज़ा खुलने की “किर्र” आवाज़ आती है। दो परछाइयाँ अंदर दाखिल होती हैं।   दो नक़ाबपोश गुंडे हैं।

गुंडा (भारी आवाज़ में) बोला - 
प्रिशा शर्मा कौन है?

प्रिशा डरकर खड़ी हो जाती है। संतोष सामने आ जाता है।

संतोष (कड़कते हुए) बोला - 
तुम लोग कौन हो?

गुंडे उन्हें पकड़ लेते हैं, और घसीटते हुए टेरेस की ओर ले जाते हैं।

टेरेस पर — 
प्रिशा चिल्ला रही है —
कृपया छोड़ दो!

गुंडे उसे ज़मीन पर पटकते हैं  और उसके पेट में एक के बाद एक... चाकू घोंपते हैं... सब नहीं दिखता, बस परछाईयों और खून की छींटों को दीवार पर गिरते हुए दिखाता है।
संतोष डर के मारे नीचे 9th फ्लोर की तरफ भागता है — उसके कपड़े खून से लथपथ हैं। वो एक केबिन में जाकर दरवाज़ा बंद कर देता है वही केबिन जहाँ आज श्रव्या खड़ी थी।

संतोष (रोते हुए, काँपते हुए) बोला - 
कोई है... कोई बचाओ!

दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से धमाके होते हैं। गुंडे दरवाज़ा तोड़ते हैं।
संतोष पीछे हटता है... एक तेज़ वार... फिर दूसरा... तीसरा... खून की बौछार दीवार तक जाती है। उसका सिर नीचे गिरता है,  सिर्फ दीवार पर उड़ते खून के छींटे दिखते हैं और कुछ नहीं।

फ्लैशबैक ख़त्म 

श्रव्या (काँपती आवाज़ में) बोली - 
इसका मतलब... जिन दागों को मैं जंग या पेंट समझ रही थी... वो... वो तो खून के थे?

कृषांत उसकी आँखों में देखता है — चुप रहता है, फिर धीरे से सिर हिलाता है।

कृषांत (गंभीर स्वर में) बोला - 
हाँ, श्रव्या... वही दाग हैं।
और... उस रात के अगले ही दिन...

वो एक लंबी साँस लेता है, फिर खिड़की की तरफ देखकर कहता है।

कृषांत बोला - 
स्मिता... 8th फ्लोर के एक केबिन में... फाँसी से लटकी मिली।
कोई नहीं जान पाया क्यों। पर तब से... उस फ्लोर की लाइटें अपने आप जल जाती हैं... और दरवाज़े अपने आप खुलते हैं।

श्रव्या का चेहरा अब सफ़ेद पड़ चुका है। वो काँपते हुए कुर्सी पर बैठ जाती है।

श्रव्या (धीरे से) बोली - 
तो... इसलिए वो फ्लोर बंद हैं...

कृषांत (धीरे-धीरे पास आते हुए) बोला - 
हाँ... और अब तुमने जिन जगहों को छुआ है...
वो सब... प्रिशा और संतोष के खून से जुड़े हैं।

लाइट झिलमिलाने लगती है, और अचानक खिड़की के शीशे में रिया की परछाई दिखती है — वही हरा टॉप, वही खाली आँखें...
श्रव्या चीख नहीं पाती... बस जम जाती है।

बैकग्राउंड में रिया की धीमी आवाज़ गूँजती है —
अब तुम जान चुकी हो... अब तुम भी हमारी कहानी का हिस्सा हो...क्योंकि कुछ सच... जानने के बाद जीना मुश्किल हो जाता है...

दोनों के बीच गहरा सन्नाटा है। बाहर से हल्की हवा का शोर, लाइट्स टिमटिमा रही हैं।

श्रव्या (धीरे-धीरे बोलते हुए, काँपते स्वर में) बोली - 
Sir.... मैंने जो लड़की देखी थी...वो हरे रंग का टॉप और काले प्लाज़ो में थी...

कृषांत का चेहरा अचानक बदल जाता है। उसकी साँस रुक-सी जाती है।

कृषांत (धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए) बोला - 
हरा... टॉप?

श्रव्या सिर हिलाती है, उसकी आँखों में अब भी डर और उलझन है।

श्रव्या बोली - 
हाँ... वही। उसके लंबे बाल थे... और वो बालकनी के किनारे तक चली गई थी...बस... पल भर में गायब हो गई...

कृषांत धीरे से पीछे हटता है, उसकी नज़र नीचे गिर जाती है। फिर वह धीरे से कुर्सी पर बैठ जाता है — जैसे किसी पुराने दर्द को दोबारा जी लिया हो।

कृषांत (बहुत धीमी आवाज़ में) बोला - 
उसी रात... प्रिशा ने भी यही कपड़े पहने थे, श्रव्या...

उसकी आँखें नम हैं, आवाज़ भारी हो जाती है।

कृषांत बोला - 
वो हरा टॉप... और काले प्लाज़ो... वही थे जो उसने उस रात पहने थे...जब... जब उसकी हत्या हुई थी...।

श्रव्या का चेहरा सख्त हो जाता है। उसकी साँसें तेज़ चल रही हैं।
वो धीरे से पीछे हटती है, उसके पैरों से कुर्सी टकराती है।

श्रव्या (काँपती आवाज़ में) बोली - 
मतलब... मतलब जो मैंने देखा... वो... प्रिशा थी?

कृषांत चुप है — उसकी नज़रें दीवार पर टिकी हैं, जैसे वो किसी को देख रहा हो। कमरे की लाइट फिर एक बार टिमटिमाती है — और खिड़की के शीशे पर एक परछाई उभरती है... वही हरा टॉप।
श्रव्या धीरे-धीरे मुड़ती है । खिड़की पर वही लड़की खड़ी है। बाल उड़ रहे हैं, चेहरा अब भी धुंधला।

श्रव्या (डरी हुई फुसफुसाहट में) बोली - 
Sir... वो... वो फिर से आ गई...

कृषांत एकदम घबराकर पीछे मुड़ता है  पर इस बार खिड़की खाली है। सिर्फ हवा की तेज़ सरसराहट और खिड़की का शीशा हिलने की आवाज़ आती है। श्रव्या पीछे हटती है, काँपती हुई कुर्सी पर बैठ जाती है।

कृषांत (धीरे से, डर और पछतावे में) बोला - 
वो अब भी यहीं है...हर बार कोई नया इस ऑफिस में आता है,
वो उसे दिखती है... शायद इसलिए... क्योंकि वो किसी को कुछ बताना चाहती है...।

श्रव्या की आँखों में आँसू हैं। उसके मन में डर से ज़्यादा अब सवाल हैं।

श्रव्या (धीरे, लगभग फुसफुसाते हुए) बोली - 
वो मुझे क्यों दिखी कृषांत sir...?
मुझसे क्या कहना चाहती है?

कृषांत उसकी तरफ देखता है उसके चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीरता है।

कृषांत (धीरे, ठंडी आवाज़ में) बोला - 
शायद... क्योंकि अगला निशाना... तुम हो।

श्रव्या की आँखों में डर जम जाता है।  और अचानक कमरे की लाइट बुझ जाती है।

अंधेरे में, प्रिशा की वही धीमी, ठंडी हँसी गूँजती है —
अब तुम भी जान चुकी हो... अब तुम भी हमारे बीच हो...

कभी-कभी जो दिखता है... वो बस शुरुआत होती है उस कहानी की जो ख़त्म नहीं हुई।

आपको क्या लगता है - 
आगे क्या होगा ?
क्या श्रव्या उनकी दुनिया का हिस्सा बन जाएगी?
क्या श्रव्या और कृषांत उनकी मौत का राज जान पाएंगे?
आखिर क्या था स्मिता की मौत का राज ? 

Agar aapko kahani pasand aa rahi ho to follow jaroor karen। Or rating or comments bhi jaroor den।  Taki mujhe motivation milta Rahe।