Bhakt Prahlaad - 11 in Hindi Spiritual Stories by Siya Kashyap books and stories PDF | भक्त प्रह्लाद - 11

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भक्त प्रह्लाद - 11

विष बना अमृत

वधिकों के हर प्रहार से प्रह्लाद बच गये। उन पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का प्रभाव नहीं हुआ था। असुरराज हिरण्यकशिपु ने भी प्रमाण के रूप में तलवारों, भालों एवं खड्ग को खंडित दशा में देखा था। वह मूर्ख अभी भी यह नहीं समझ पाया था कि प्रह्लाद पर किसी भी अस्त्र-शस्त्र का कोई प्रभाव न होना प्रभु श्रीहरि विष्णु की लीला है, किंतु उसकी आँखों पर तो अपने सर्वशक्तिमान होने के अभिमान की काली पट्टी बँधी हुई थी, तो फिर उसे वास्तविकता का भान कैसे होता! वह शक्ति के मद में अंधा हो चुका था, जिस कारण उसे उचित भी अनुचित दिखाई देता था। प्रह्लाद के साथ जो घटना घटी थी, वह प्रभु का एक संकेत ही तो था, किंतु उस जैसे दुष्ट व अत्याचारी को इस प्रकार के संकेतों की सुध-बुध कहाँ रहती है।

यद्यपि प्रह्लाद भगवान् विष्णु की कृपा से वधिकों के प्रहार से बच गए थे, किंतु पिता असुरराज हिरण्यकशिपु की त्योरियाँ अभी भी चढ़ी रहीं। प्रह्लाद को इस बात की कोई चिंता नहीं थी कि कौन हर्ष में है और कौन विषाद में डूबा हुआ है, जबकि असुरराज के लिए यह असहनीय बात थी कि उसी का पुत्र उसके परम शत्रु की आड़ ले। वह इतना क्रूर और निर्दयी हो गया था कि उसने कोमल-सी काया वाले अपने पुत्र को कारागृह में डालने का आदेश दे दिया था।

बिना किसी भय के प्रह्लाद कारागृह चले गए। वहाँ प्रकाश का कोई चिह्न तक न था। यदि था तो बस अंधकार ही अंधकार, फिर भी वे विचलित नहीं हुए और विचलित होना भी कैसा, जब सृष्टि के पालनकर्ता श्रीहरि विष्णु स्वयं उनके साथ थे। यही कारण था कि उस अंधकार से भरे कारागृह में भी अपने अंतः स्थल में अपने प्रिय आराध्य देव भगवान् विष्णु की उज्ज्वल मूर्ति देखकर प्रकाशित हो उठे थे।

दूसरी ओर असुरराज हिरण्यकशिपु प्रह्लाद को मारने के लिए कोई उपाय सोच रहा था और इसके लिए वह अपने चाहने वालों एवं निकट संबंधियों से भी सलाह ले रहा था। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रहलाद को किस प्रकार मृत्यु के मुख में धकेले। एक दिन एक राजदरबारी ने उसे बताया, “असुरराज! प्रह्लाद को मारने का मेरे पास एक बड़ा ही सरल उपाय है।”

“उपाय!” असुरराज की आँखें 'उपाय' शब्द सुनते ही खिल उठीं, “तो शीघ्र बताओ।” 

“असुरराज! उपाय यह है कि तेज विष मिलाकर कुछ लड्डू बनाए जाएँ और फिर उसका सेवन करने के लिए उन्हें प्रहलाद को दिया जाए।” दरबारी बोला।

“बात तो तुम्हारी उचित है।” असुरराज कुटिल मुसकान के साथ बोला, “हम ऐसा ही करेंगे।”

इसके पश्चात् असुरराज हिरण्यकशिपु ने उस दरबारी की सलाह के अनुसार विष के बने लड्डुओं को तैयार करवाया, वह यह सोच-सोचकर मन ही मन प्रसन्न हुआ जा रहा था कि इस बार प्रह्लाद का बच पाना असंभव है। उसने एक दासी को उन लड्डुओं को लेकर प्रह्लाद के पास भेजा । प्रह्लाद के पास पहुँचकर वह दासी सहानुभूति पूर्वक बोली, “राजकुमार, महारानी ने तुम्हारे लिए कुछ स्वादिष्ट लड्डू भेजे हैं। उन्होंने विशेष रूप से इन्हें तुम्हारे लिए ही तैयार करवाया है। तुम्हें भूख लगी होगी। अतः इन्हें खा लो।”

इतना कहकर उस दासी ने लड्डुओं का पात्र प्रह्लाद के सामने रख दिया। प्रह्लाद उन लड्डुओं को भला कैसे मना कर सकते थे, क्योंकि उन लड्डुओं को माता कयाधू ने विशेष रूप से उनके लिए भेजा था। माता की याद आते ही उनकी आँखों से जलधारा बहने लगी। प्रह्लाद ने जैसे ही पात्र उठाया तो उन्हें अपने प्रिय आराध्य देव भगवान् विष्णु की याद आ गई। वे सोचने लगे कि जिनके लिए आज वे कारागृह में हैं, जिनके लिए प्राणदंड मिला, भला वे अपने उन्हीं इष्टदेव को विस्मृत कर उन लड्डुओं का सेवन कैसे कर सकते थे ? उन्होंने हाथ जोड़कर अपने आराध्य देव का स्मरण किया और फिर पहले उन्हीं की सेवा में लड्डुओं का भोग अर्पित किया।

प्रह्लाद ने सेवन करने के लिए एक लड्डू हाथ में उठाया तो वह उन्हें अमृतफल के समान प्रतीत हुआ। लड्डू का गोल-सुंदर रूप-स्वरूप देखने भर से उनकी आँखों में एक विचित्र सी प्रसन्नता उत्पन्न हुई। लड्डू का एक छोटा सा भाग ज्यों ही प्रह्लाद ने अपने मुख में रखा, उसके अलौकिक स्वाद ने उन्हें रोमांचित कर दिया। ऐसा स्वाद उन्हें आज तक किसी भी भोज्य पदार्थ से प्राप्त न हुआ था। उनका मन स्वर्गिक आनंद की अनुभूति से भर उठा। लड्डुओं में विष मिलाकर प्रह्लाद को मार डालने का जो षड्यंत्र असुरराज हिरण्यकशिपु ने रचा था, उस विष को अमृत में परिवर्तित करके श्रीहरि विष्णु ने अपने भक्त को जैसे इन लड्डुओं का उपहार भेजा था। स्पष्ट था कि इन लड्डुओं से प्रह्लाद की मृत्यु की बात तो दूर, प्रह्लाद का एक रोम भी प्रभावित नहीं हो सकता था, बल्कि उनके सेवन से प्रह्लाद का तन-मन आनंदातिरेक से झूमने लगा था।

प्रह्लाद ज्यों-ज्यों लड्डुओं का सेवन कर रहे थे, कारागृह के सैनिकों की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं। वे सोच रहे थे कि तीक्ष्ण विष मिले लड्डुओं का सेवन करके प्रह्लाद अब मरे कि तब मरे! उनका विचार था कि प्रह्लाद विषैले लड्डुओं के छोटे से भाग का सेवन करते ही परलोक सिधार जाएगा, किंतु यह क्या! एक-एक करके प्रह्लाद ने सभी लड्डुओं का सेवन प्रसन्नतापूर्वक कर लिया और उनके विष का क्षीण सा प्रभाव भी नहीं पड़ा। यह देखकर कारागृह के प्रहरियों के आश्चर्य की सीमा न रही।

जब रानी कयाधू को उक्त घटना का पता चला तो वे चिंतित हो उठीं। उन्हें अपने प्रिय पुत्र की रह-रहकर याद आने लगी। वे प्रह्लाद से मिलने व उन्हें देखने के लिए व्याकुल हो उठीं। वे यह सोच-सोचकर चिंतित हुई जा रही थीं कि न जाने किस अवस्था में होगा उनका पुत्र। पुत्र-स्नेह की पीड़ा से वे विह्वल हो उठीं। जिस पुत्र को वे अपने प्राणों से भी अधिक प्रेम करती थीं, जिसको देखते ही उनका मन आनंदित हो उठता था—आज उनका वही पुत्र जीवन और मृत्यु के फेर में फँसा हुआ था, यही सोचकर उनकी आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। वे शीघ्र ही प्रह्लाद को देखने के लिए कारागृह आ गईं। जब उन्होंने कारागृह में प्रवेश किया तो वहाँ अंधकार को देखकर कंपित स्वर से अपने लाड़ले को पुकारने लगीं, “प्र... प्रह... प्रह्लाद!” रानी कयाधू के स्वर को प्रह्लाद ने तुरंत पहचान लिया, “माता!”

प्रिय पुत्र को अपने पास पाकर माता को कुछ सांत्वना मिली। इसके पश्चात् दोनों एक-दूसरे के गले से लिपट गए। प्रह्लाद को अपनी बाँहों में लेते ही रानी कयाधू की आँखों से प्रसन्नता के आँसू छलक उठे। बहुत देर तक वे प्रह्लाद को स्नेहपूर्ण दृष्टि से निहारती रहीं।

प्रह्लाद ने अपनी माता का बड़ा सम्मान किया। रानी कयाधू के लिए यह बहुत बड़ी बात थी कि उनका प्रिय पुत्र जीवित अवस्था में उनके सम्मुख है, किंतु अब दूसरी चिंता ने उन्हें आ घेरा था। वे सोच रही थीं कि इस अँधेरी कोठरी में उनका लाड़ला अकेला कैसे रहता होगा! सही समय पर उसे भोजन भी दिया जाता होगा कि नहीं! एक और बात उन्हें सता रही थी कि जब हिरण्यकशिपु को पता चलेगा कि लड्डू में मिलाया हुआ विष प्रह्लाद के लिए अमृत बन गया तो वह यह सहन नहीं कर पाएगा। इसे वह अपनी कड़ी हार के रूप में देखेगा और इस हार का बदला लेने के लिए वह उनके प्रिय सुकोमल पुत्र पर अब न जाने कौन सा अत्याचार कर बैठे ? वे हिरण्यकशिपु के क्रूर व अत्याचारी व्यवहार से भली-भाँति परिचित थीं। उन्हें यही भय सता रहा था कि जैसे ही हिरण्यकशिपु को प्रह्लाद के जीवित होने का समाचार मिलेगा तो वह प्रह्लाद के साथ पहले से भी अधिक क्रूर व्यवहार करेगा। माता के मुख पर चिंता की रेखाएँ देख प्रह्लाद ने पूछा, “माता! आप चिंतित क्यों हैं ?” “नहीं पुत्र!” रानी कयाधू ने स्नेह से प्रह्लाद को निहारा।

“माता! आपकी चिंता का कुछ तो कारण अवश्य है। कृपया मुझे बताएँ, संभव है कि मैं आपको कोई समाधान सुझा सकूँ।” प्रह्लाद ने आग्रह करते हुए कहा।

“पुत्र! तुम अपने पिता के व्यवहार से भली-भाँति परिचित हो। जब उन्हें तुम्हारे जीवित होने की सूचना मिलेगी, तो अब वे न जाने तुम पर कौन सा नवीन अत्याचार करेंगे।” रानी कयाधू व्याकुल स्वर में बोलीं। अपनी माता की व्याकुलता को देखकर प्रह्लाद ने उन्हें सांत्वना दी और प्रभु पर विश्वास करने का परामर्श दिया। इसके पश्चात् रानी कयाधू दुःखी मन से कारागृह से महल की ओर लौट गईं।