“वो दरवाज़ा जो कभी बंद नहीं हुआ…”
रात के करीब 12 बज रहे थे।
पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था, जैसे किसी ने आवाज़ों को कैद कर लिया हो। दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ गूँजती, और फिर सब कुछ फिर से शांत हो जाता।
राघव अपनी पुरानी हवेली के बाहर खड़ा था।
वो हवेली… जिसे लोग "मौत का घर" कहते थे।
“तू पागल हो गया है क्या?” उसके दोस्त अर्जुन ने कहा था, “वहाँ जो भी गया, वो वापस नहीं आया।”
लेकिन राघव के लिए ये सिर्फ एक डरावनी कहानी नहीं थी।
उसके पिता की मौत भी इसी हवेली में हुई थी… और आज वो सच्चाई जानने आया था।
उसने गहरी सांस ली और हवेली का जंग लगा दरवाज़ा धक्का देकर खोला।
“चूंssss…”
दरवाज़े की आवाज़ ने जैसे अंधेरे को जगा दिया।
अंदर धूल की मोटी परत थी, दीवारों पर मकड़ी के जाले लटक रहे थे। हर कदम के साथ लकड़ी का फर्श चरमराता, जैसे कोई उसके पीछे-पीछे चल रहा हो।
राघव ने अपनी टॉर्च ऑन की।
अचानक उसे लगा… कोई उसे देख रहा है।
“कोई है?” उसने आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं।
लेकिन फिर…
ऊपर वाली मंजिल से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आई।
ठक… ठक… ठक…
राघव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वो सीढ़ियों की तरफ बढ़ा।
हर कदम भारी लग रहा था, जैसे कोई उसे रोकना चाहता हो।
जैसे ही वो ऊपर पहुंचा…
एक कमरा खुद-ब-खुद खुल गया।
धड़ाम!!!
राघव डर गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।
वो कमरे के अंदर गया।
कमरे में एक पुरानी कुर्सी थी… और उसके सामने एक बड़ा आईना।
आईने पर खून से लिखा था—
“यहाँ से वापस मत जाना…”
राघव के हाथ कांपने लगे।
“ये सब बकवास है…” उसने खुद से कहा।
तभी अचानक आईने में उसकी परछाई हिलने लगी।
लेकिन… वो खुद तो स्थिर खड़ा था।
“ये… ये कैसे…”
आईने में उसकी परछाई मुस्कुरा रही थी।
एक डरावनी, अजीब मुस्कान…
और फिर…
उसकी परछाई धीरे-धीरे आईने से बाहर आने लगी।
राघव पीछे हट गया।
“नहीं… ये सच नहीं हो सकता…”
लेकिन वो चीज़ अब उसके सामने खड़ी थी।
वो… बिल्कुल राघव जैसा दिखता था।
लेकिन उसकी आंखें पूरी काली थीं।
“तू यहाँ क्यों आया…” उस चीज़ ने भारी आवाज़ में कहा।
राघव डर के मारे बोल नहीं पा रहा था।
“तू सच जानना चाहता था ना?” वो फिर बोला।
राघव ने हिम्मत जुटाकर पूछा—
“मेरे पापा के साथ क्या हुआ था?”
वो चीज़ धीरे-धीरे हंसी।
“वो भी यही सवाल लेकर आए थे…”
“और?” राघव ने कांपते हुए पूछा।
“और… वो यहीं रह गए…”
अचानक कमरे का दरवाज़ा बंद हो गया।
धड़ाम!!!
अब कमरे में सिर्फ राघव और वो अजीब चीज़ थे।
“इस हवेली में जो आता है…” वो धीरे-धीरे बोला, “वो कभी वापस नहीं जाता।”
राघव ने भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला।
तभी अचानक…
उसे पीछे से किसी ने पकड़ लिया।
उसने मुड़कर देखा—
वो उसके पिता थे।
लेकिन उनका चेहरा सड़ा हुआ था, आंखें खाली थीं।
“पापा…” राघव की आंखों में आंसू आ गए।
“भाग जा यहाँ से…” उसके पिता ने धीमी आवाज़ में कहा।
“नहीं पापा, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा!”
“ये जगह तुझे भी खत्म कर देगी…”
तभी वो काली आंखों वाला राघव फिर हंसने लगा।
“अब बहुत देर हो चुकी है…”
अचानक दीवारों से खून टपकने लगा।
कमरा घूमने लगा।
राघव को लगा जैसे कोई उसकी आत्मा खींच रहा हो।
“पापा… बचाइए…” उसने चिल्लाया।
उसके पिता ने उसे जोर से धक्का दिया।
राघव नीचे गिर गया…
और फिर…
सब कुछ शांत हो गया।
सुबह की हल्की रोशनी हवेली में फैल रही थी।
गाँव के कुछ लोग हवेली के बाहर खड़े थे।
“कल रात कोई अंदर गया था…” एक बूढ़ा आदमी बोला।
तभी दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
चूंssss…
सब लोग डर के मारे पीछे हट गए।
दरवाज़े पर कोई खड़ा था।
वो… राघव था।
लेकिन कुछ अलग था।
उसकी आंखें पूरी काली थीं।
और उसके चेहरे पर वही डरावनी मुस्कान थी।
“मैं वापस आ गया…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
तभी वो धीरे-धीरे बोला—
“अब अगला कौन आएगा…?”
ट्विस्ट 👇
उस दिन के बाद…
गाँव में जो भी उस हवेली के पास जाता…
उसे लगता कोई उसे बुला रहा है।
और हर बार…
हवेली के अंदर एक नया चेहरा दिखता—
जो पहले कभी बाहर था।